Saturday, April 25, 2009

ख्वाब में आ कर वो मेरी नींद उड़ाती थी बहुत

ख्वाब में आ कर वो मेरी नींद उड़ाती थी बहुत
हर घड़ी वो देख कर मुस्कुराती थी बहुत

छोड़ ही देना पड़ा घबरा कर उसके शहर को
याद उसकी रात दिन मुझको रुलाती थी बहुत

अपनी बाहों में जब जा कर लेती थी रंजो आलम
आ के एक अन्दाज़ में मुझको हंसाती थी बहुत

अपने दिल की बात वो कभी मुझ से कहती न थी
दूसरों के प्यार के किस्से सुनाती थी बहुत

चाहती थी सिर्फ़ मेरी ही नज़र उस पर पड़े
गैरों की नज़रों से वो खुद को बचाती थी बहुत

दिन तो कट जाता था दोस्तो के साथ में
रात में लेकिन वो मुझको याद आती थी बहुत

--अज्ञात

3 comments:

  1. नमस्कार,
    इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
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    सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
    कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
    शब्दकार
    रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

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  2. बहुत बढिया रचना प्रेषित की है।बधाई।

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  3. खूबसूरत पोस्ट ..

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