Sunday, May 30, 2010

खंजर तेरे से अब मेरा सर क्यों नहीं

खंजर तेरे से अब मेरा सर क्यों नहीं जाता,
शर्मिंदा हूँ मैं डूब के मर क्यों नहीं जाता,

दिल टूट गया जिस्म में फिर दिल नहीं रहा,
गुज़रा हूँ परेशानी से गुज़र क्यों नहीं जाता

--अज्ञात

Wednesday, May 19, 2010

Nikki jehi kudi -- Satinder Sartaj

Sunday, May 16, 2010

आज दुल्हन के लाल जोड़े में

आज दुल्हन के लाल जोड़े में,
उसे उसकी सहेलियों ने सजाया होगा…

मेरी जान के गोरे हाथों पेर
सखियों ने मेहन्दी को लगाया होगा…

बहुत गहरा चढेगा मेहन्दी का रंग,
उस मेहन्दी में उसने मेरा नाम छुपाया होगा…

रह रह कर रो पड़ेगी
जब जब उसको ख़याल मेरा आया होगा…

खुद को देखगी जब आईने में,
तो अक्स उसको मेरा भी नज़र आया होगा…

लग रही होगी बला सी सुन्दर वो,
आज देख कर उसको चाँद भी शरमाया होगा

आज मेरी जान ने
अपने माँ बाप की इज़्ज़त को बचाया होगा

उसने बेटी होने का
दोस्तों आज हर फ़र्ज़ निभाया होगा

मजबूर होगी वो सबसे ज़्यादा,
सोचता हूँ किस तरह उसने खुद को समझाया होगा

अपने हाथों से उसने
हमारे प्रेम के खतों को जलाया होगा

खुद को मजबूत बना कर उसने
अपने दिल से मेरी यादों को मिटाया होगा

टूट जाएगी जान मेरी,
जब उसकी माँ ने तस्वीर को टेबल से हटाया होगा

हो जाएँगे लाल मेहन्दी वाले हाथ,
जब उन काँच के टुकड़ों को उसने उठाया होगा

भूखी होगी वो जानता हूँ में,
कुछ ना उस पगली ने मेरे बगैर खाया होगा

कैसे संभाला होगा खुदको
जब उसे फेरों के लिए बुलाया होगा

कांपता होगा जिस्म उसका,
हौले से पंडित ने हाथ उसका किसी और को पकड़ाया होगा

में तो मजबूर हूँ पता है उसे,
आज खुद को भी बेबस सा उसने पाया होगा

रो रो के बुरा हाल हो जाएगा उसका,
जब वक़्त उसकी विदाई का आया होगा

बड़े प्यार से मेरी जान को
मया बाप ने डॉली में बिताया होगा

रो पड़ेगी आत्मा भी
दिल भी चीखा ओर चीलाया होगा

आज अपने माँ बाप के लिए
उसने गला अपनी खुशियों का दबाया होगा

रह ना पाएगी जुदा होकेर मुझसे
डर है की ज़हर चुपके से उसने खाया होगा

डोली में बैठी इक ज़िंदा लाश को
चार कंधो पेर कहरों ने उठाया होगा

--अज्ञात

Source : http://www.shers.in/shayari/dard-bhari-shayari/aaj-dulhan-ke-laal-jode-mein-5990/

वो राज़ की बातें महफिलों में करता फिरता था

वो राज़ की बातें महफिलों में करता फिरता था
हम उसका नाम तन्हाइयों को भी बताते न थे

--अज्ञात

मगर ये सच है कि उम्मीद्वार मैं भी हूँ

वो एक तीर है जिसका शिकार मैं भी हूँ
मैं एक हर्फ़ सही दिल के पार मैं भी हूँ

वो सामने रहा दरिया का दूसरा साहिल
अगर जहाज़ न डूबा तो पार मैं भी हूँ

यहाँ तो मौत का सैलाब आता रहता है
बहुत बचा था, मगर अब कि बार मैं भी हूँ

न जाने किसके मुकद्दर में वो लिखा होगा
मगर ये सच है कि उम्मीद्वार मैं भी हूँ

किसे खबर है कि नीले समन्दरों की तरह
बहुत दिनों से बहुत बेकरार मैं भी हूँ

--राहत इंदोरी

नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया

नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया
हमें किसी से निभाना भी तो नहीं आया

जला के रख लिया हाथों के साथ दामन तक
तुम्हें चराग बुझाना भी तो नहीं आया

नये मकान बनाए तो फासलों की तरह
हमें ये शहर बसाना भी तो नहीं आया

वो पूछता था मेरी आँख भीगने का सबब
मुझे बहाना बनाना भी तो नहीं आया

वसीम देखना मुड मुड के वो उसी की तरफ
किसी को छोड़ के जाना भी तो नहीं आया

--वसीम बरेलवी

मुझसे गिले हैं, मुझपे भरोसा नहीं उसे

मुझसे गिले हैं, मुझपे भरोसा नहीं उसे
ये सोच कर हम ने भी तो रोका नहीं उसे

वो शक्स कभी चाँद सितारों से पूछे
है कौन सी वो रात, जब सोचा नहीं उसे

अलफ़ाज़ तीर बन के उतारते रहे दिल में
सुनते रहे चुप चाप ही, टोका नहीं उसे

सागर ये मोहब्बत नहीं असूल-ए-वफ़ा है
हम जान तो देंगे मगर धोका नहीं उसे

--सागर

Saturday, May 8, 2010

उन्हें नफरत हुई सारे जहाँ से

उन्हें नफरत हुई सारे जहाँ से
नयी दुनिया कोई लाये कहाँ से

तुम्हारी बात लगती है मुझे तीर
निगाह का काम लेते हो ज़बां से

--अज्ञात

Thursday, May 6, 2010

मंजिल भी नहीं पाई, और रास्ता भी नहीं बदला

कश्ती भी नहीं बदली, दरिया भी नहीं बदला,

हम डूबने वालों का जज्बा भी नहीं बदला,

है शौक-ए-सफर ऐसा, इक उम्र हुई हम ने,

मंजिल भी नहीं पाई, और रास्ता भी नहीं बदला

--अज्ञात

ਏ ਅਖਿਯਾਂ ਦੋ ਹੀ ਚੰਗਿਯਾਂ ਨੇ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂ ਚਾਰ ਨਾ ਕਰ ਲਾਈਨ

ਏ ਅਖਿਯਾਂ ਦੋ ਹੀ ਚੰਗਿਯਾਂ ਨੇ, ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂ ਚਾਰ ਨਾ ਕਰ ਲਾਈਨ,
ਫਿਰ ਪਛਤਾਉਣਾ ਪੈ ਜੂਗਾ ਕਿਧਰੇ ਪ੍ਯਾਰ ਨਾ ਕਰ ਲਾਈਨ

--ਅਗ੍ਯਾਤ

Wednesday, May 5, 2010

जाने एक नौजवान को क्या सनक चढ़ी...

जाने एक नौजवान को क्या सनक चढ़ी...
जाने थी क्या खुराफात उसने मन मे गढ़ी...
वो जोश मे उठा और तेज़ी से चलने लगा...
एक सज्जन का तेज़ी से पीछा करने लगा...

बेचारे सज्जन भी ये देखकर बड़ा घबराए...
अपने कदम थे उन्होने बड़ी तेज़ी से बढ़ाए...
उनके काँधे पे एक छोटा सा बैग लटका था...
बस उसी मे इस नौजवान का जी अटका था...

सज्जन बैग सीने से चिपकाए ज़ोर से भागे...
लगा शायद नौजवान से निकल गये आगे...
पर वो भी दुगनी रफ़्तार से दौड़ रहा था...
सज्जन का पीछा बिल्कुल न छोड़ रहा था...

सज्जन भागकर तब रेलवे स्टेशन पहुँचे...
बड़ी तेज़ी से थे प्लॅटफॉर्म की ओर लपके...
पर उसने अभी भी उनका पीछा ना छोड़ा...
वो भी उनके पीछे पीछे प्लॅटफॉर्म पे दौड़ा...

लोग तो बस खड़े खड़े तमाशा देख रहे थे...
ओलंपिक जैसी दौड़ से आँख सेंक रहे थे...
फिर पोलीस भी कहीं से सीन मे आई...
नौजवान को पकड़ा और लाठियाँ बजाई...

पर वो सज्जन अभी शायद नही थे थके...
वो तो बस दौड़ते ही रहे और नही रुके..
पोलीस को शक हुआ तो उन्हे भी रोका...
पर वो तो दे गये पोलीस को ही धोखा...

बैग फेंका और वो भीड़ मे कहीं खो गये...
फिर जाने कहाँ वो चुपचाप चंपत हो गये...
बैग खोला तो वहाँ खड़े सब गये सहम..
उसके अंदर रखा हुआ था एक टाइम बम...

फिर तुरंत वहाँ बम निरोधक दस्ता आया...
फिर उन्होने उस बम को फटने से बचाया...
फिर बात चली नौजवान उसी का साथी है...
हो ना हो ये भी ज़रूर कोई आतंकवादी है...


फिर चार लाठियों मे ही वो बिखर गया...
उसके खुलासे से हर कोई था सिहर गया...
बोला मैं कोई आतंकवादी नही सरकार...
मैं तो हूँ बस एक अदना सा बेरोज़गार...

जाने कबसे घर मे था चूल्हा नही जला...
कोशिश की तो पर कोई काम ना मिला....
ये सब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था..
इसलिए एक कोने मे बैठा रो रहा था...

फिर मैने उसे बम रखते हुए देख लिया...
इसीलिए मैं उसके पीछे पीछे हो लिया...
सोचा था कहीं न कहीं तो ये बम फूटेगा...
बस बेरोज़गारी से वही मेरा दामन छूटेगा...

इसके धमाके मे चुपचाप मरने चला था...
परिवार के लिए आज कुछ करने चला था...
मरता तो सरकार से पैसे ही मिल जाते....
मेरे मरने से परिवार के दिन फिर जाते....

--दिलीप तिवारी

E-mail : dileep.tiwari8@gmail.com

Tuesday, May 4, 2010

दिन भर की सब बातें सारे काम तुम्हारे नाम

दिन भर की सब बातें सारे काम तुम्हारे नाम
जब से लिखी हैं हमने अपनी हर एक शाम तुम्हारे नाम
दौलत के बाज़ार में अपनी क्या कीमत है फिर भी
जो भी मिल सकता हो मेरे दाम तुम्हारे नाम

--अज्ञात

अपनी कलम को बेच दिया और लिखने का फन बेच दिया

अपनी कलम को बेच दिया और लिखने का फन बेच दिया
उसको माली कैसे कह दूं जिसने गुलशन बेच दिया

भाई के सर पर दुश्मन ने कैसा सच्चा हाथ रखा
आँगन में दीवार कि खातिर आधा आँगन बेच दिया

दुनिया ने क्या ज़ुल्म किये हैं इसका कोई ज़िक्र नहीं
पर ये चर्चा गली गली है बेवा ने तन बेच दिया

न मन पर कुछ बोझ रखा और न तन पर कुछ भार सहा
बीवी ने फरमाइश की तो माँ का कंगन बेच दिया

--अज्ञात

वो मेरे घर नहीं आता, मैं उसके घर नहीं जाता

वो मेरे घर नहीं आता, मैं उसके घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तालुक मर नहीं जाता

--नवाज़ दिओबंदी

Monday, May 3, 2010

इस दिल में तेरे मिलने का अरमान भी न हो !

माना कि उम्र भर तू मेरा हो नही सकता

पर ऐसा भी क्या कि तू मेरा मेहमान भी न हो !

हो जाये जो होना है पर ऐसा न हो कभी

कि इस दिल में तेरे मिलने का अरमान भी न हो !

--अज्ञात

तुमने तो कह दिया मोहब्बत नहीं मिलती

तुमने तो कह दिया मोहब्बत नहीं मिलती

मुझको तो ये भी कहने की मोहलत नहीं मिलती

तुझको तो यूं खैर शहर के लोगो से खौफ था

और मुझको तो अपने घर से इजाज़त नहीं मिलती

--अज्ञात

Sunday, May 2, 2010

आज इस मोड़ पर लाये हैं उजाले मुझको

आज इस मोड़ पर लाये हैं उजाले मुझको
एक अँधेरे का समुन्दर है संभाले मुझको

जी में आता है तेरे ज़ुल्म-ओ-सितम सब कह दूं
पर रोक लेते हैं लब-ए-इज़हार के ताले मुझको

कुछ तो तेरी राह-ए-गुज़र थी हमदम
कुछ सर-ए-राह मिले लूटने वाले मुझको

वो कब तलक मुझको अपनी पलकों पे सजाये फिरती
कर दिया उसने भी अश्कों के हवाले मुझको

कैद अपनी ही रिवायत की हदों में हूँ
कोई तो हो जो इस अँधेरे से निकाले मुझको

मुझको हर सिम्त अपने होने की बू आती है
कही मेरा होना ही मार ना डाले मुझको

--अज्ञात

Source : http://wafakadard.com/ahmed-farazs-collections/