Saturday, June 17, 2017

शिकायतों की पाई पाई

शिकायतों की पाई पाई जोड़कर रखी थी मैंने,

उसने गले लगाकर सारा हिसाब बिगाड़ दिया…”॥

बहुत अंदर जला देती हैं

बहुत अंदर तक जला देती है,

वो शिकायतें जो बयाँ नही होती....

Friday, June 9, 2017

रास आ गए हैं

रास आ गये हैं कुछ लोगों को हम
कुछ लोगों को ये बात रास नही आई

अज्ञात

Tuesday, May 30, 2017

रस्सी जैसी ज़िन्दगी

रस्सी जैसी जिंदगी...तने-तने हालात.....

एक सिरे पे ख़्वाहिशें...दूजे पे औकात....!

--अज्ञात

Thursday, November 3, 2016

काश कोई देखने वाला होता

एक यह ज़िद कि कोई ज़ख्म न देख पाए दिल के मेरे

और एक यह हसरत कि काश कोई देखने वाला होता

Saturday, October 29, 2016

हम अपने आप से कुछ इस तरह हुए रुखसत

उसी की तरहा मुझे सारा ज़माना चाहे ,
वो मेरा होने से ज्यादा मुझे पाना चाहे ?.

मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा तेरा ,
ये मुसाफिर तो कोई और ठिकाना चाहे .

एक बनफूल था इस शहर में वो भी ना रहा,
कोई अब किस के लिए लौट के आना चाहे .

ज़िन्दगी हसरतों के साज़ पे सहमा-सहमा,
वो तराना है जिसे दिल नहीं गाना चाहे .

हम अपने आप से कुछ इस तरह हुए रुखसत,
साँस को छोड़ दिया जिस तरफ जाना चाहे .

--Unknown...

Monday, August 15, 2016

ख़याल से भी खूबसूरत था वो

ख़याल से भी खूबसूरत था वो , ख़्वाब से ज्यादा नाजुक
गवां दिया हमने ही उसको , देर तक आज़माने में  ..

दे दिया क्या क्या मुझे

चाँद चेहरा जुल्फ दरिया , बात खुशबू, दिल चमन
एक तुझे देकर खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे

#बशीर_बद्र

Tuesday, August 9, 2016

हमारी खताओं का हिसाब रखते जाना

हमारी खताओं का हिसाब रखते जाना
उनकी अदाओं का हिसाब मुमकिन नहीं

मौत उसकी जिसका ज़माना करे अफ़सोस

मौत उसकी जिसका ज़माना करे अफ़सोस
यूं तो सभी आये हैं दुनिया में मरने के लिए

जो लौट आएं तो कुछ कहना नहीं

जो लौट आएं तो कुछ कहना नहीं बस देखना उन्हें गौर से

जिन्हें मंज़िलों पे खबर हुई के ये रास्ता कोई और था

--अज्ञात

Saturday, August 6, 2016

रात तेरे ख्वाब .. मददगार गुज़रे

भूलने लगे जो विसाल-ए-यार गुज़रे
लम्हात-ए-याद मगर यादग़ार गुज़रे

कट गई तमाम शब देखते देखते
रात तेरे ख्वाब .. मददगार गुज़रे

फ़क़त एक इश्क़ से घबरा गए आप
ये हादसे संग मेरे .. कई बार गुज़रे

मिलो तुम हरदम महंगाई की तरह
उम्मीद लिए हम सरे-बाज़ार गुज़रे

ज़रुरतमंद हूँ ये ख़बर क्या फ़ैली
बचकर सरेराह दोस्त-यार गुज़रे

मुफ़्त अच्छी है शायरी ‘अमित’ की
कहते हुए दर से मेरे खरीदार गुज़रे

--अमित हर्ष

Tuesday, July 12, 2016

दायरा हर बार बनाता हूँ ज़िन्दगी के लिए

दायरा हर बार बनाता हूं ज़िदगी के लिए
लकीरें वहीं रहती है, मैं खिसक जाता हूं

Monday, July 11, 2016

तज़ुर्बा दोबारा कर लूं

तज़ुर्बा कहता है मोहब्बत से किनारा कर लूँ
और दिल कहता है ये तज़ुर्बा दोबारा कर लूँ

Sunday, July 3, 2016

मैं बादशाह था सबको बताता रहता हूँ

तअल्लुका़त की क़ीमत चुकाता रहता हूँ
मैं उसके झूठ पे भी मुस्कुराता रहता हूँ

मगर ग़रीब की बातों को कौन सुनता है
मैं बादशाह था सबको बताता रहता हूँ

ये और बात कि तनहाइयों में रोता हूँ
मगर मैं बच्चों को अपने हँसाता रहता हूँ

तमाम कोशिशें करता हूँ जीत जाने की
मैं दुशमनों को भी घर पे बुलाता रहता हूँ

ये रोज़-रोज़ की *अहबाब से मुलाक़ातें
मैं आप क़ीमते अपनी गिराता रहता हूँ

हसीब सोज़

Friday, May 27, 2016

जाने किस हाल में होगा

मुद्दतो बाद आज फिर परेशान हुआ है दिल,
जाने किस हाल में होगा मुझसे रुठने वाला...

अज्ञात

Wednesday, February 24, 2016

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले सेमरस्सिम ना सही फिर भी कभी तो
रस्मो राहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ

कुछ  मेरे पिंडारे मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मानने के लिए आ

एक उमरा से हूँ लज़्जते गिरिया से भी महरूम
आईराहत-ए-जान मुझको रुलाने के लिए आ

ऐब तक दिले खुश-फहम को हैं तुझ से उम्मीदें
यह आख़िरी शमा भी बुझाने के लिए आ

माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज जताने के लिए आ

जैसे तुझे आते हैं ना आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज ना जाने के लिए आ

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

Friday, February 19, 2016

कुछ दिन के बाद मैं भी उसे भूल-सा गया

उसने भी छोड़ दी मेरे बारे मे गुफ्तगू
कुछ दिन के बाद मैं भी उसे भूल-सा गया

Sunday, January 24, 2016

दिल-ए-नादान की ज़िद है के तेरा साथ रहे

दिल-ए-नादान की ज़िद है के तेरा साथ रहे
मर्ज़ी-ए-वक़्त कहता है के बिछड़ना होगा

Thursday, October 22, 2015

न मुल्क न शहर न ये घर अपना

न मुल्क न शहर ना ये घर अपना
दिल से जाता नहीं है ये डर अपना

बर्फ पे नीले पड़े जिस्म उन नौनिहालो के
सांप भी रो पड़ते जिन्हें देते ज़हर अपना

कैस अब होते तो कहाँ बसर करते
सहरा में बसा है किसी का शहर अपना

रक़ाबत अपने बस का रोग न था
रकीब से कैसे बचाता मैं घर अपना

अमोल सरोज