Saturday, November 5, 2011

वो हर किसी को मुस्कुरा के देखते हैं

आज सारे चराग बुझा के देखते हैं
ज़िंदगी तुझे और पास आ के देखते हैं

अमावसों की रात गर देखना हो चाँद
हम उन्हें छत पे बुला के देखते हैं

मेरी रुखसती पे ये कैसी बेचैनी है उनको
मुझे जो जीने पे आ आ के देखते हैं

जब खुल के की बात, तो शरमा गयी वो
चलो आज खुद ही शरमा के देखते हैं

ये इश्क की कसौटी कोई आसान नहीं प्यारे
परवाने खुद को जला के देखते हैं

तू आशिक न सही बीमार समझ ही इनायत कर दे
हम इक बार ज़ोर से कराह के देखते हैं

उन्हें पसंद हैं आप, ये ग़लतफहमी ठीक नहीं
वो हर किसी को मुस्कुरा के देखते हैं

दुनिया भर के अफकारों से सुकून नहीं पाया
चलो आज माँ के पाँव दबा के देखते हैं

गर बेरुखी ही है अंजाम-ए-दोस्ती
फिर आज किसी दुश्मन से हाथ मिला के देखते हैं

हम गिरे तो क्या उनकी औकात तो नहीं बदली
देखो वो अब भी 'मिश्रा' को सर झुका के देखते हैं

--अभिषेक मिश्रा

1 comment:

  1. खूबसूरत ग़ज़ल ...
    मुबारक हो !

    ReplyDelete