Tuesday, March 30, 2010

मैंने कागज़ पे भी देखी हैं बना कर आँखें

मुझ से मिलती हैं तो मिलती हैं चुरा कर आँखे
फिर वो किसके लिए रखती है सज़ा कर आँखें

मैं उन्हें देखता रहता हूँ जहाँ तक देखूं
एक वो हैं, के जो देखे ना, उठा कर आँखें

उस जगह आज भी बैठा हूँ अकेला यारो
जिस जगह छोड़ गये थे वो मिला कर आँखें

मुझ से नज़रें वो अक्सर चुरा लेता है सागर
मैंने कागज़ पे भी देखी हैं बना कर आँखें

--सागर

4 comments:

  1. मुझ से मिलती हैं तो मिलती हैं चुरा कर आँखे
    फिर वो किसके लिए रखती है सज़ा कर आँखें

    मैं उन्हें देखता रहता हों जहाँ तक देखूं
    एक वो हैं के जो देखे ना उठा कर आँखें

    बहुत सुन्दर...

    ReplyDelete
  2. मुझ से मिलती हैं तो मिलती हैं चुरा कर आँखे
    फिर वो किसके लिए रखती है सज़ा कर आँखें

    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

    ReplyDelete
  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete