Sunday, March 14, 2010

हमारे ख़्वाब थे वो बुन रही थी

हमारे ख़्वाब थे वो बुन रही थी
अँधेरी रात तारे चुन रही थी
मैं आँखों से बयाँ गम रहा था
वो आँखों ही से बैठी सुन रही थी
--अज्ञात

1 comment:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete