Tuesday, June 9, 2009

सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है

सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
इल्ज़ाम आईनों पे लगाना फ़िज़ूल है.

तेरी नवाज़िशें हों तो कांटा भी फूल है
ग़म भी मुझे क़बूल, खुशी भी क़बूल है

उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
कच्चे घड़े पे तैर के जाना फ़िज़ूल है

जब भी मिला है ज़ख्म का तोहफ़ा दिया मुझे
दुश्मन ज़रूर है वो मगर बा-उसूल है

--अंजुम रहबर

1 comment:

  1. khoobsurat ghazal hai ek-o-ik sher dilkash
    उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
    कच्चे घड़े पे तैर के जाना फ़िज़ूल है
    hasil-e-ghazal...

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