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Sunday, October 16, 2022

अगर वो पूछ ले हमसे

अगर वो पूछ लें हमसे, कहो किस बात का गम है।
तो फिर किस बात का गम हो, अगर वो पूछ लें हमसे।।

अगर वो पूछ लें हमसे, कहाँ रहते हो शामों में।
तो शामों में कहाँ हम हों, अगर वो पूछ लें हमसे।।

मलाल-ए-इश्क़ इतना है, सवालों की गिरह में हूँ ।
जो तुम पूछो- जवाबें दूँ, जो न पूछो- किसे कह दूँ !

मुनासिब है न मुंह खोलो, न पूछो और न कुछ जानो। 
पर उस निगाह का क्या हो, जिरह करती है जो हमसे।।

गुल-ए-गुलज़ार हो तुम, हर हवा का रुख तुम्ही पर है।
मगर झूमो तो यूँ झूमो, जो टूटो - पास आ जाओ।।

मैं ही बता देता, पर डर है - है किस्सा मोहब्बत का,
कि अंत आगाज़ का जब हो, आगाज़ अंत का न हो।।

Saturday, July 3, 2021

ये दिया भी जला के देख लिया

ज़ख़्म-ए-दिल भी दिखा के देख लिया 
बस तुम्हें आज़मा के देख लिया 

दाग़-ए-दिल से भी रौशनी न मिली 
ये दिया भी जला के देख लिया 

शिकवे मिटते हैं क्यूँकर आप से आप 
सामने उन के जा के देख लिया 

मुज़्दा ऐ हसरत-ए-दिल-ए-पुर-शौक़ 
उस ने फिर मुस्कुरा के देख लिया 

आबरू और भी हुई पानी 
अश्क-ए-हसरत बहा के देख लिया 

तर्क-ए-उल्फ़त के सुन लिए इल्ज़ाम 
राज़-ए-दिल को छुपा के देख लिया 

जो न देखा था आज तक हम ने 
दिल की बातों में आ के देख लिया 

कोई अपना नहीं यहाँ ऐ 'अर्श' 
सब को अपना बना के देख लिया

अर्श मलसियानी

Sunday, January 31, 2021

आगे मुकद्दर आपका है

जलते घर को देखने वालों
भूस का छप्पर आपका है
आग के पीछे तेज़ हवा
आगे मुकद्दर आपका है

उसके क़त्ल पर मैं भी चुप था
मेरी बारी अब आई
मेरे क़त्ल पर आप भी चुप हो 
अगला नंबर आपका है

नवाज़ देवबंदी

Saturday, December 14, 2019

समझने लगे वो हमें खास यूं ही

बड़ा खुशनुमा है ये एहसास यूं ही
वो आने लगे हैं ज़रा पास यूं ही

ये हर बात पे मशवरा क्यों है गोया
 समझने लगे वो हमें खास यूं ही

यूं गैरों से मिलना न मसला बड़ा है
मगर चुभ रही है ये इक फांस यूं ही

है हिजरत की बातें न जाने ये कैसी
उखड़ने लगी है मेरी सांस यूं ही

समझ लें इशारे वो ख़ुद इस ग़ज़ल में
लगाए हुए है ये दिल आस यूं ही

आशीष प्रकाश

Saturday, July 27, 2019

मैं प्यार के सरोवर में आग लिख रहा हूँ।

प्राणों में ताप भर दे वो राग लिख रहा हूँ
मैं प्यार के सरोवर में आग लिख रहा हूँ।

मेरी जो बेबसी है, उस बेबसी को समझो
उजडे़ हुए चमन को मैं बाग लिख रहा हूँ।

दामन पे मेरे जाने कितने लहू के छींटे
धोया न जा सके जो वो दाग लिख रहा हूँ।

दुनिया है मेरी कितनी ये तो नहीं पता, पर
धरती है मेरी जितनी वो भाग लिख रहा हूँ।

कितने अमीर होंगे दस बीस फ़ीसदी बस
कमज़ोर आदमी का मैं त्याग लिख रहा हूँ।

सब लोग मैल अपनी मल-मल के धो रहे हैं
असहाय साबुनों का मैं झाग लिख रहा हूँ

     - डी. एम. मिश्र
🙏🌹🙏......

Monday, June 24, 2019

रात गुज़री हमारी सितारों के साथ

गुमनाम, अनजाने तारों के साथ
रात गुज़री हमारी सितारों के साथ

याद है, तन्हाई है, ग़म है, शब् है
अच्छी कट रही है चारों के साथ

माना होते हैं कान पर ज़ुबां तो नहीं
कबतलक करें बात दीवारों के साथ

फिक जाते हैं बनके रद्दी दिन ढलते ही
हादसा ये रोज़ होता है अख़बारों के साथ

देख तन्हा चले आते हैं मिलने हमसे
दोस्ती सी हो गई है अशआरों के साथ

खेलने बाज़ी इश्क़ की हाथ में दिल लिए
तैयार शादीशुदा भी यहाँ कुंवारों के साथ

मझधार में ही मिलेगी मंज़िलें हमारी
कर लिया हैं किनारा, किनारों के साथ

लहरें ही करेंगीं पार नैया कश्ती की
रिश्ता तोड़ दिया है पतवारों के साथ

क्या सही है और क्या ग़लत ‘अमित’
एक द्वन्द्व सी छिड़ी है विचारों के साथ

--अमित हर्ष

Friday, June 21, 2019

ये बात उस तरह भी नहीं थी

गुंजाइश, कोई जगह भी नहीं थी
बिछड़ने की .. वजह भी नहीं थी

जाने कब कैसे गाँठ पड़ गई
कहीं कोई गिरह भी नहीं थी

जिस तरह समझी है तुमने 
ये बात उस तरह भी नहीं थी

वही दलील दिल, दर्द .. दूरी की
और तो कोई जिरह भी नहीं थी

शिक़स्त ही वाबस्ता थी दोनों तरफ 
मेरी हार उसकी फ़तह भी नहीं थी

डूबते गए सब शायरी में जिसमें
गहराई क्या सतह भी नहीं थी

चाँद-सितारों, नींद, ख्वाबों से सजा ली
जिस रात की कोई सुबह भी नहीं थी

पास-दूर, दोस्त-दुश्मन, अज़ीज़-गैर
वो हमारी किसी तरह भी नहीं थी

जायेगी देखना प्राण लेकर ही
वैसे पीड़ा इतनी असह भी नहीं थी

जो मायने निकाले गए मेरी शायरी के
उतनी समझ तो मुझे भी नहीं थी

बिखरे पड़े थे जहन में ‘अमित’ के
ख्यालों की कोई तह भी नहीं थी

--अमित हर्ष

Thursday, June 13, 2019

पर हमें प्यार अभी से ढेर सारा आ रहा है

ये दिल फिर तुम पर हमारा आ रहा है
एक मोदी ही नहीं जो दुबारा आ रहा है

आते आते आता है आदाब-ए-इश्क़ यूँ तो
पर हमें प्यार अभी से ढेर सारा आ रहा है

वो गली वो घर कब का छोड़ चुके हैं हम
जिस पते पर अब ख़त तुम्हारा आ रहा है

ख़ुद ब ख़ुद धुल गईं हैं आँखें अश्क से
अब साफ़ नज़र हर नज़ारा आ रहा है

अब चाँद से होंगे मुख़ातिब रात तमाम
सूरज तो सुबह का थका हारा आ रहा है

तुमने तो कहा था रखना अपना ‘अमित’
पर ख़्याल क्यूँ रह रहकर तुम्हारा आ रहा है

--अमित हर्ष

Sunday, April 28, 2019

जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं

जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों मे बंट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से मे कुछ बचा ही नहीं

जिन्दगी मौत तेरी मंज़िल है
और तो कोई रास्ता ही नहीं

जिसके कारण फसाद होते हैं
उसका कोई अता पता ही नहीं

ज़िन्दगी, अब बता कहाँ जाये
बाज़ार मे ज़हर मिला ही नहीं

सच घटे या बढ़े, तो सच ना रहे
झूठ की कोई इन्तिहां ही नहीं

धन के हाथों बिके हैं सब कानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम मे जड़ दो
आइना झूठ बोलता ही नहीं

-कृष्ण बिहारी नूर

Monday, December 31, 2018

वो वादे भी करता है तो सरकार की तरह

ख़ुशनुमा, दिलकश, फ़स्ल-ए-बहार की तरह 
रंग-ए-दुनिया भी बिलकुल इश्तिहार की तरह 

महज़ एक नई तारीख़ बताने की ख़ातिर 
सूरज निकलता है रोज़ बस अख़बार की तरह 

वफ़ा की जगह अब नफ़ा तलाशते हैं
लोग इश्क़ भी करते हैं कारोबार की तरह

रस्मन, मजबूरन तो कभी ख़ुशी के साथ
हम मनाएंगे भी तुझे तो त्यौहार की तरह 

टूट जाएँ पुराने तो नये हाज़िर हैं
वो वादे भी करता है तो सरकार की तरह 

बाँधते हैं एहतियात से फिर क्यों  रेज़ा रेज़ा
उम्मीदें भी बिखर जातीं हैं एतबार की तरह 

कुछ नवाजेंगे मोहब्बत-ओ-दाद से खुलकर
कुछ नज़रअंदाज़ भी करेंगे हरबार की तरह

हक़ीक़त तो कभी कहीं कुछ फ़साने ‘अमित’
दर्ज करता रहता है यहाँ अशआर की तरह

अमित हर्ष

Friday, December 28, 2018

हर बात पे ऐ दोस्त ! ग़म नहीं करते

लज्ज़त-ए-ज़िन्दगी  कम नहीं करते
हर बात पे ऐ दोस्त !  ग़म नहीं करते

दिक्कतें खटखटाती है दरवाजा रह रह के
पर उनसे मुलाक़ात अब हम नहीं करते

मायूस हो जायेंगी मंजिलें न पा कर तुझे
बढ़ाकर आगे  यूं पीछे क़दम नहीं करते

नेमत है खुदा की और इबादत भी है ये
मेरी जान !  इश्क में शरम नहीं करते

न ज़िक्र तकलीफ का,  न शिकवा कोई
सितम पे उनके यूं  सितम नहीं करते

मसला ही हुआ हल, न खातमा किरदार का
बीच कहानी किस्सा यूं खतम नहीं करते

बेपनाह मोहब्बतों से नवाज़ा गैरों ने यूं तो
फ़क़त अहबाब ‘अमित’ पे करम नहीं करते

* * अहबाब ahbaab = मित्रगण, दोस्त friends (हबीब का बहुवचन)

-- अमित हर्ष

Friday, October 5, 2018

तजुर्बे के मुताबिक खुद को ढाल लेता हूं

*तजुर्बे के मुताबिक़, खुद को ढाल लेता हूं,,!*
*कोई प्यार जताए तो, जेब संभाल लेता हूं,,,!!*

*नहीं करता थप्पड़ के बाद, दूसरा गाल आगे,,!*
*खंजर खींचे कोई, तो तलवार निकाल लेता हूं,,,!!*

*वक़्त था सांप की, परछाई डरा देती थी,,!*
*अब एक आध मै, आस्तीन में पाल लेता हूं,,!!*

*मुझे फासने की, कहीं साजिश तो नहीं,,!*
*हर मुस्कान ठीक से, जांच पड़ताल लेता हूं,,,!!*

*बहुत जला चुका उंगलियां, मैं पराई आग में,,!*
*अब कोई झगड़े में बुलाए, तो मै टाल देता हूं,,,!!*

*सहेज के रखा था दिल, जब शीशे का था,,!*
*पत्थर का हो चुका अब, मजे से उछाल लेता हूं,,,,!!*

Tuesday, September 25, 2018

रात तेरे ख्वाब मददगार गुज़रे

भूलने लगे जो विसाल-ए-यार गुज़रे
लम्हात-ए-याद मगर यादग़ार गुज़रे

कट गई तमाम शब देखते देखते
रात तेरे ख्वाब .. मददगार गुज़रे

फ़क़त एक इश्क़ से घबरा गए आप
ये हादसे संग मेरे .. कई बार गुज़रे

मिलो तुम हरदम महंगाई की तरह
उम्मीद लिए हम सरे-बाज़ार गुज़रे

ज़रुरतमंद हूँ ये ख़बर क्या फ़ैली
बचकर सरेराह दोस्त-यार गुज़रे

मुफ़्त अच्छी है शायरी ‘अमित’ की
कहते हुए दर से मेरे खरीदार गुज़रे

~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ ` ~ `

bhoolne lage jo visaal-e-yaar guzare
lamhaat-e-yaad magar yaadgaar guzare

kat gayi tamaam shab dekhte dekhte
raat tere khwaab .. madadgaar guzare

faqat ek ishq se ghabraa gaye aap
ye haadase sang mere .. kai baar guzre

milo tum hardam mehngaayi kii tarah
ummeed liye ham sare bazaar guzre

zarooratmand hoon ye khabar kya failii
bachkar sareraah dost-yaar guzare

muft achchhi hai shayari ‘amit’ kii
kahte huye sar se mere khreedaar guzre

लंबी कर दी

मुख़्तसर सी थी सो शुरुआत लम्बी कर दी
कुछ इस तरह से हमने बात लम्बी कर दी

सुबह तलक टूट जायेंगे मालूम था ख़्वाब
बस इस ख़ातिर खींचकर रात लम्बी कर दी

ऐ ज़िन्दगी तुझसे मिलकर अच्छा तो लगा
पर तूने बेवजह मुलाक़ात लम्बी कर दी

छाई कुछ यूँ कि घटती ही नहीं तनिक
घटा ने बढ़ाकर बरसात लम्बी कर दी

बात बात में ‘अमित’ ये छोटी सी ग़ज़ल
तुमने देखो बिना-बात लम्बी कर दी

Saturday, October 29, 2016

हम अपने आप से कुछ इस तरह हुए रुखसत

उसी की तरहा मुझे सारा ज़माना चाहे ,
वो मेरा होने से ज्यादा मुझे पाना चाहे ?.

मेरी पलकों से फिसल जाता है चेहरा तेरा ,
ये मुसाफिर तो कोई और ठिकाना चाहे .

एक बनफूल था इस शहर में वो भी ना रहा,
कोई अब किस के लिए लौट के आना चाहे .

ज़िन्दगी हसरतों के साज़ पे सहमा-सहमा,
वो तराना है जिसे दिल नहीं गाना चाहे .

हम अपने आप से कुछ इस तरह हुए रुखसत,
साँस को छोड़ दिया जिस तरफ जाना चाहे .

--Unknown...

Saturday, August 6, 2016

रात तेरे ख्वाब .. मददगार गुज़रे

भूलने लगे जो विसाल-ए-यार गुज़रे
लम्हात-ए-याद मगर यादग़ार गुज़रे

कट गई तमाम शब देखते देखते
रात तेरे ख्वाब .. मददगार गुज़रे

फ़क़त एक इश्क़ से घबरा गए आप
ये हादसे संग मेरे .. कई बार गुज़रे

मिलो तुम हरदम महंगाई की तरह
उम्मीद लिए हम सरे-बाज़ार गुज़रे

ज़रुरतमंद हूँ ये ख़बर क्या फ़ैली
बचकर सरेराह दोस्त-यार गुज़रे

मुफ़्त अच्छी है शायरी ‘अमित’ की
कहते हुए दर से मेरे खरीदार गुज़रे

--अमित हर्ष

Sunday, July 3, 2016

मैं बादशाह था सबको बताता रहता हूँ

तअल्लुका़त की क़ीमत चुकाता रहता हूँ
मैं उसके झूठ पे भी मुस्कुराता रहता हूँ

मगर ग़रीब की बातों को कौन सुनता है
मैं बादशाह था सबको बताता रहता हूँ

ये और बात कि तनहाइयों में रोता हूँ
मगर मैं बच्चों को अपने हँसाता रहता हूँ

तमाम कोशिशें करता हूँ जीत जाने की
मैं दुशमनों को भी घर पे बुलाता रहता हूँ

ये रोज़-रोज़ की *अहबाब से मुलाक़ातें
मैं आप क़ीमते अपनी गिराता रहता हूँ

हसीब सोज़

Wednesday, February 24, 2016

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले सेमरस्सिम ना सही फिर भी कभी तो
रस्मो राहे दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ

कुछ  मेरे पिंडारे मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मानने के लिए आ

एक उमरा से हूँ लज़्जते गिरिया से भी महरूम
आईराहत-ए-जान मुझको रुलाने के लिए आ

ऐब तक दिले खुश-फहम को हैं तुझ से उम्मीदें
यह आख़िरी शमा भी बुझाने के लिए आ

माना की मुहब्बत का छिपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज जताने के लिए आ

जैसे तुझे आते हैं ना आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज ना जाने के लिए आ

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

Sunday, October 4, 2015

आज नहीं, तो कल निकलेगा

कोशिश कर, हल निकलेगा
आज नही तो, कल निकलेगा।

अर्जुन के तीर सा निशाना साध,
जमीन से भी जल निकलेगा ।

मेहनत कर, पौधो को पानी दे,
बंजर जमीन से भी फल निकलेगा ।

ताकत जुटा, हिम्मत को आग दे,
फौलाद का भी बल निकलेगा ।

जिन्दा रख, दिल में उम्मीदों को,
समन्दर से भी गंगाजल निकलेगा ।

कोशिशें जारी रख कुछ कर गुजरने की,
जो है आज थमा-थमा सा, वो चल निकलेगा ।

-अज्ञात