चाहे जितना मुंह से भी पुकारो मुझे
जिंदगी हूँ तुम्हारी गुज़ारो मुझे
अपने घर में हो चारों तरफ आईने
मैं संवारू तुम्हे तुम संवारो मुझे
मैं तुम्हारी नज़र में तो इक खेल हूँ
चाहे जीतो मुझे चाहे हारो मुझे
--अंजुम रहबर
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Sunday, April 18, 2010
जिंदगी हूँ तुम्हारी गुज़ारो मुझे
और तो कुछ भी पास निशानी तेरी
और तो कुछ भी पास निशानी तेरी
देखती रहती हूँ तस्वीर पुरानी तेरी
लड़कियां और भी मनसूब तेरे नाम से हैं
क्या कोई मेरी तरह भी है दीवानी तेरी
मैं अगर होंट भी सी लूं तो मेरी खामोशी
सारी दुनिया को सूना देगी कहानी तेरी
मेरे फूलों में महकता है पसीना तेरा
और हाथो में खनकती है जवानी तेरी
राजमहलों में कनीजों का रहा है कब्ज़ा
और जंगल में भटकती रही रानी तेरी
--अंजुम रहबर
मिलना था इत्तफाक, बिछड़ना नसीब था
मिलना था इत्तफाक, बिछड़ना नसीब था
वो फिर उतनी दूर हो गया, जितना करीब था
बस्ती के सारे लोग ही आतिस-परस्त थे
घर जल रहा था, और समंदर करीब था
अंजुम मैं जीत कर भी यही सोचती रही
जो हार कर गया, वो बड़ा खुशनसीब था
--अंजुम रहबर
Wednesday, June 24, 2009
जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है,
जिनके आँगन में अमीरी का शजर लगता है,
उनका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है
--अन्जुम रहबर
उनका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है
--अन्जुम रहबर
Tuesday, June 9, 2009
सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
इल्ज़ाम आईनों पे लगाना फ़िज़ूल है.
तेरी नवाज़िशें हों तो कांटा भी फूल है
ग़म भी मुझे क़बूल, खुशी भी क़बूल है
उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
कच्चे घड़े पे तैर के जाना फ़िज़ूल है
जब भी मिला है ज़ख्म का तोहफ़ा दिया मुझे
दुश्मन ज़रूर है वो मगर बा-उसूल है
--अंजुम रहबर
इल्ज़ाम आईनों पे लगाना फ़िज़ूल है.
तेरी नवाज़िशें हों तो कांटा भी फूल है
ग़म भी मुझे क़बूल, खुशी भी क़बूल है
उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
कच्चे घड़े पे तैर के जाना फ़िज़ूल है
जब भी मिला है ज़ख्म का तोहफ़ा दिया मुझे
दुश्मन ज़रूर है वो मगर बा-उसूल है
--अंजुम रहबर
Sunday, March 29, 2009
उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
कच्चे घड़े पर तैर कर जाना फिज़ूल है
--अंजुम रहबर
कच्चे घड़े पर तैर कर जाना फिज़ूल है
--अंजुम रहबर
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