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Monday, February 28, 2011

मैं जी हुज़ूरी से इंकार करने वाला हूँ...

अमीरे शहर को तलवार करने वाला हूँ,
मैं जी हुज़ूरी से इंकार करने वाला हूँ...

--मुनव्वर राना

Thursday, November 18, 2010

मैं पट्रीयों की तरहा ज़मी पर पड़ा रहा

मैं पट्रीयों की तरहा ज़मी पर पड़ा रहा
सीने से गम गुज़रते रहे रेल की तरह

--मुनव्वर राणा

Tuesday, November 9, 2010

बुलंदी देर तक किस शक्स के हिस्से मे रहती है

बुलंदी देर तक किस शक्स के हिस्से मे रहती है,
बहुत ऊंची इमारत हर घड़ी ख़तरे मे रहती है

बहुत जी चाहता है क़ैद ए जान से हम निकल जायें,
तुम्हारी याद भी लेकिन इसे मलबे मे रहती है

यह ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नही सकता,
मैं जब तक घर ना लौटूं मेरी माँ सजदे मे रहती है

अमीरी रेशम-ओ-कमख्वाब मे नंगी नज़र आई
ग़रीबी शान से इक टाट के पर्दे मे रहती है

मैं इंसान हूँ बहक जाना मेरी फ़ितरत मे शामिल है,
हवा भी उसको छूकर देर तक नशे मे रहती है

मोहब्बत मे परखने जाँचने से फ़ायदा क्या है,
कमी थोड़ी बहुत हर एक के शज्जर मे रहती है

ये अपने आप को तक्सीम कर लेता है सूबों मे ,
खराबी बस यही हर मुल्क के नक्शे मे रहती है

--मुनव्वर राणा

Tuesday, February 9, 2010

दिल पहले कहाँ इस तरह गमगीन रहा है

दिल पहले कहाँ इस तरह गमगीन रहा है
लगता है कोई मुझसे तुझे छीन रहा है

कुछ मोड़ भी आते है मोहब्बत में खतरनाक ,
कुछ इश्क भी खतरों का शौकीन रहा है

--मुनव्वर राना

Thursday, February 4, 2010

किसी का कद बढ़ा देना, किसी के कद को कम कहना

किसी का कद बढ़ा देना, किसी के कद को कम कहना
हमें आता नहीं, ना-मोहतरम को मोहतरम कहना

चलो चलते हैं, मिलजुल कर वतन पे जान देते हैं
बहुत आसान है कमरे में वन्दे-मातरम कहना

--मुनव्वर राणा

Saturday, December 12, 2009

सीख जायेगा

हवा के रुख पे रहने दो, जलना सीख जायेगा
कि बच्चा लड़खड़ायेगा तो चलना सीख जायेगा

वो पहरों बैठ कर तोते से बातें करता है
चलो अच्छा है, अब नज़रें बदलना सीख जायेगा

इसी उम्मीद पर बदन को हमने कर लिया छलनी
कि पत्थर खाते खाते पेड़ फलना सीख जायेगा

ये दिल बच्चे की सूरत है, इसे सीने में रहने दो
बुरा होगा जो ये घर से निकलना सीख जायेगा

तुम अपना दिल मेरे सीने में कुछ दिन के लिये रख दो
यहां रह कर ये पत्थर भी पिघलना सीख जायेगा

--मुनव्वर राणा

Monday, November 2, 2009

नशा किसी के प्यार का है

नदी का शोर नहीं है ये आब शार का है
यहाँ से जो भी सफ़र है वो अब उतार का है

तमाम जिस्म को आँखे बना के राह तको,
तमाम खेल मोहब्बत में इंतज़ार का है

अभी शराब न देना मज़ा न आयेगा ,
अभी तो आंखों में नशा किसी के प्यार का है...

--मुनव्वर राणा


आबशार = Waterfall

Source : http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=5107&Itemid=34

Thursday, August 27, 2009

खाली खाली न यूँ दिल का मकां रह जाये

खाली खाली न यूँ दिल का मकां रह जाये
तुम गम-ए-यार से कह दो, कि यहां रह जाये

रूह भटकेगी तो बस तेरे लिये भटकेगी
जिस्म का क्या भरोसा ये कहां रह जाये

एक मुद्दत से मेरे दिल में वो यूँ रहता है
जैसे कमरे में चरागों का धुआं रह जाये

इस लिये ज़ख्मों को मरहम से नहीं मिलवाया
कुछ ना कुछ आपकी कुरबत का निशां रह जाये

--मुनव्वर राणा

Wednesday, August 19, 2009

दवा की तरह खाते जाईयें गाली बुजुर्गों की

दवा की तरह खाते जाईयें गाली बुजुर्गों की,
जो अच्छे फल है उनका ज़ायका अच्छा नहीं होता
--मुनव्वर राणा

Sunday, August 16, 2009

हमारी ज़िन्दगी का इस तरह हरसाल कटता है

हमारी ज़िन्दगी का इस तरह हर साल कटता है
कभी गाड़ी पलटती है, कभी तिरपाल कटता है
दिखाते हैं पड़ौसी मुल्क़ आँखें, तो दिखाने दो
कभी बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है?
--मुनव्वर राणा

Sunday, May 17, 2009

तुझ से बिछड़ा तो पसन्द आ गई बेतरतीबी

तुझ से बिछड़ा तो पसन्द आ गई बेतरतीबी
इस से पहले मेरा कमरा भी गज़ल जैसा था
--मुनव्वर राणा

बेतरतीबी=disordered, unarranged

Wednesday, May 13, 2009

मैं चाहता हूँ फिर से वो दिन पलट आयें

मैं चाहता हूँ फिर से वो दिन पलट आयें
कि माँ के चुल्लू को मेरा गिलास होना पड़े
--मुनव्वर राणा

Friday, May 1, 2009

रिश्तों की कहकशां सर-ए-बाज़ार बेचकर

रिश्तों की कहकशां सर-ए-बाज़ार बेचकर
घर को बचा लिया दर-ओ-दीवार बेचकर

शौहरत की भूख हमको कहाँ ले के आ गयी
हम मोहतरम हुए भी तो किरदार बेचकर

वो शक्स सूरमा है, मगर बाप भी तो है
रोटी खरीद लाया है, तलवार बेचकर

जिसके कलाम ने मुद्दतों बोये हैं इनकलाब
अब पेट पालता है, वो अखबार बेचकर

अब चाहे जो सुलूक करे आपका ये शहर
हम गांव से तो आ गये घर बार बेच कर

--मुनव्वर राणा

Saturday, April 18, 2009

शिकायतें तो मुझे मौसम-ए-बहार से है

शिकायतें तो मुझे मौसम-ए-बहार से है
खिज़ान तो फूलने फलने के बाद आता है
--मुनव्वर राणा

Tuesday, April 14, 2009

वो मुझको छोड़ न देता, तो और क्या करता

वो मुझको छोड़ न देता, तो और क्या करता
मैं वो किताब हूँ, जिसके कईं वर्क ना रहे
--मुनव्वर राणा

Tuesday, March 31, 2009

मुनव्वर माँ के सामने कभी खुलकर नहीं रोना,

मुनव्वर माँ के सामने कभी खुलकर नहीं रोना,
जहाँ बुनियाद हो, इतनी नमी अच्छी नहीं होती
--मुनव्वर राणा

तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फलक

तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फलक
मुझको मेरी मां की मैली ओढ़नी अच्छी लगी
--मुनव्वर राणा

Saturday, March 28, 2009

उलझता रहता हूँ यूँ तुम्हारी यादों से

उलझता रहता हूँ यूँ तुम्हारी यादों से
के जैसे बच्चे के हाथों में ऊन आ जाये
--मुनव्वर राणा

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं

कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं

सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं

चारागर तेरी महारथ पे यक़ीं है लेकिन
क्या ज़रूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊं

बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊं

शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊं

--मुनव्वर राणा

Saturday, March 21, 2009

खुद शाख-ए-गुल को टूटते देखा है आंख से

खुद शाख-ए-गुल को टूटते देखा है आंख से
किस दर्जा हौंसला अभी बूढ़े शजर में है
--मुनव्वर राणा