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Saturday, January 19, 2013

फोन करने का सिलसिला रखना

अब न कोई मुगालता रखना
अपने कद का पता सदा रखना

घर सलामत रखे तुम्हारा जो
दोस्तों से वो फासला रखना

वक्त के साथ मत बदल जाना
प्यार के पेड़ को हरा रखना

दूर है जो करीब होगा वो
अपने होंटों पे बस दुआ रखना

मंजिलों पे अगर नज़र है तो
अपनी नज़रों में रास्ता रखना

मिलना जुलना तुषार मुश्किल हो
फोन करने का सिलसिला रखना

--नित्यानंद तुषार

Thursday, January 13, 2011

जब भी मिलना हो किसी से, ज़रा दूरी रखना

जब भी मिलना हो किसी से, ज़रा दूरी रखना
जान ले लेता है, सीने से लगाने वाला

--नित्यानंद तुषार

Wednesday, December 8, 2010

ये तो सोचो सवाल कैसा है

ये तो सोचो सवाल कैसा है
देश क़ा आज हाल कैसा है

जिससे मज़हब निकल नहीं पाते
साजिशों क़ा वो जाल कैसा है

आए दिन हादसे ही होते हैं
सोचता हूँ ये साल कैसा है

आपने आग को हवा दी थी
जल गए तो मलाल कैसा है

जान लेता है बेगुनाहों की
आपका ये कमाल कैसा है

दुश्मनी से `तुषार` क्या हासिल
दोस्ती क़ा ख़याल कैसा है

--नित्यानंद तुषार

Source : http://ntushar.blogspot.com/2010/12/blog-post.html

Sunday, November 21, 2010

तुम्हारे वास्ते क्या सोचते हैं

मुकद्दर आजमाना चाहते हैं
तुम्हें अपना बनाना चाहते हैं

तुम्हारे वास्ते क्या सोचते हैं
निगाहों से बताना चाहते हैं

गलत क्या है, जो हम दिल मांग बैठे
परिंदे भी ठिकाना चाहते हैं

परिस्थितियां ही अक्सर रोकती हैं
मुहब्बत सब निभाना चाहते हैं

बहुत दिन से हैं इन आँखों में आंसू
तुषार अब मुस्कुराना चाहते हैं

--नित्यानंद तुषार
http://ntushar.blogspot.com/

Thursday, July 2, 2009

धुंध सी छाई हुई है आज घर के सामने

धुंध सी छाई हुई है आज घर के सामने
कुछ नज़र आता नहीं है अब नज़र के सामने

सर कटाओ या हमारे सामने सजदा करो
शर्त ये रख दी गयी है हर बशर के सामने

सोचता हूँ क्यूं अदालत ने बरी उसको किया
क़त्ल करके जो गया सारे नगर के सामने

देर तक देखा मुझे और फ़िर किसी ने ये कहा
आज तो मुझको पढ़ो मैं हूं नज़र के सामने

कल सड़क पर मर गये थे ठंड से कुछ आदमी
देश की उन्नति बताते पोस्टर के सामने

लौटना मत बीच से पूरा करो अपना सफ़र
हल करो वो मुश्किलें जो हैं डगर के सामने

--नित्यानंद तुशार

Tuesday, May 12, 2009

हमेशा पास रहते हैं मगर पल भर नहीं मिलते

हमेशा पास रहते हैं मगर पल भर नहीं मिलते
बहुत चाहो जिन्हें दिल से, वही अक्सर नहीं मिलते

ज़रा ये तो बताओ तुम, हुनर कैसे दिखायें वो
यहाँ जिन बुत-तराशों को सही पत्थर नहीं मिलते

हमें ऐसा नहीं लगता यहां पर वार भी होगा
यहां के लोग हमसे तो कभी हंस कर नहीं मिलते

हमारी भी तमन्ना थी उड़ें आकाश में लेकिन
विवश हो कर यही सोचा, सभी को पर नहीं मिलते

गज़ब का खौफ छाया है, हुआ क्या हादसा यारो
घरों से आज कल बच्चे हमें बाहर नहीं मिलते

हकीकत में उन्हें पहचान अवसर की नहीं कुछ भी
जिन्होंने ये कहा अक्सर, हमें अवसर नहीं मिलते

--नित्यानंद तुशार