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Sunday, March 29, 2009

रुक गया आंख से बहता हुआ दरिया कैसे

रुक गया आंख से बहता हुआ दरिया कैसे
ग़म का तूफान तो बहुत तेज़ था, ठहरा कैसे

हर घड़ी तेरे खयालों में घिरा रहता हूं
मिलना चाहूँ तो मिलूं खुद से तनहा कैसे

मुझ से जब तर्क-ए-तालुक का किया अहद तो फ़िर
मुड़ के मेरी तरफ आपने देखा कैसे

मुझ को खुद पर ही भरोसा नहीं होने पाता
लोग कर लेते हैं ग़ैरों पर भरोसा कैसे

दोस्तो शुक्र करो, मुझसे मुलाकात हुई
ये ना पूछो कि लुटी है मेरी दुनिया कैसे

देखी होटों की हंसी ज़ख्म ना देखे दिल के
आप दुनिया की तरह खा गये धोखा कैसे

और भी अहल-ए-खिरद अहल-ए-जुनून थे मौजूद
लुट गये हम ही तेरी बज़्म में तनहा कैसे

इस जनम में तो कभी मैं न इधर से गुज़रा
तेरी राहों में मेरे नक्श-ए-कफ-ए-पा कैसे

ज़ुल्फें चेहरे से हटा लो, कि हटा दूं मैं खुद
नूर के होते हुए इतना अंधेरा कैसे

--कृष्ण बिहारी नूर

tark-e-taalluk=sambandh todna
ahad=waada
ahal-e-khirad=intelligent
ahal-e-zunoon=deewaane
bazm=mahfil,sabhaa
naqsh-e-cuff-e-paa=pairon ke nishaan

Friday, March 27, 2009

रात हो, दिन हो, गफलत हो के बेदारी हो

रात हो, दिन हो, गफलत हो के बेदारी हो
उसको देखा तो नहीं उसको सोचा है बहुत
--कृष्ण बिहारी नूर

Sunday, March 22, 2009

गवाह चाह रहे थे वो मेरी बेगुनाही का

गवाह चाह रहे थे वो मेरी बेगुनाही का
ज़ुबान से कह न सका कुछ खुदा गवाह के बाद
--कृष्ण बिहारी नूर