Showing posts with label Ahmed Faraz. Show all posts
Showing posts with label Ahmed Faraz. Show all posts

Friday, November 9, 2012

फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद

फिर उसी रहगुज़र पर शायद
हम कभी मिल सकेँ, मगर शायद

जान पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर, शायद

मुन्तज़िर जिन के हम रहे उन को
मिल गये और हम-सफ़र शायद

जो भी बिछ्डे हैँ कब मिले हैँ फ़राज़
फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद

अहमद फ़राज़

Wednesday, October 17, 2012

पयाम आए हैं उस यार-ए-बेवफा के मुझे

पयाम आए हैं उस यार-ए-बेवफा के मुझे
जिसे क़रार ना आया कहीं भुला के मुझे

जूदाईयाँ हों तो ऐसी की उम्र भर ना मिले
फरेब तो दो ज़रा सिलसिले बढ़ा के मुझे

मैं खुद को भूल चुका था मगर जहाँ वाले
उदास छोड़ गये आईना दिखा के मुझे

--अहमद फराज़

Sunday, March 18, 2012

वो ही महसूस करते है तपिश दर्द-ए-दिल की फ़राज

वो ही महसूस करते है तपिश दर्द-ए-दिल की फ़राज
जो अपने आप से बढ कर किसी से प्यार करते है

--अहमद फराज़

Wednesday, November 23, 2011

तू बहुत देर से मिला है मुझे

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे

दिल धड़कता नहीं सुलगता है
वो जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे

लबकुशा हूँ तो इस यक़ीन के साथ
क़त्ल होने का हौसला है मुझे

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे

कौन जाने के चाहतों में 'फ़राज़'
क्या गँवाया है क्या मिला है मुझे

--अहमद फ़राज़

Audio : https://sites.google.com/site/mmgulaamalighazals/ZindgiSeYehiGilaHaiMujhe%40Mp3HunGama.Com.mp3?attredirects=0&d=1

Sunday, October 16, 2011

अजब नहीं कि अगर याद भी ना आऊँ उसे

करूँ ना याद अगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुन_गुनाऊँ उसे

वो ख़ार-ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिन्द
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे

[ख़ार=thorn, कांटे]

ये लोग तज़करे करते हैं अपने लोगों से
मैं कैसे बात करूँ और कहाँ से लाऊँ उसे

[तज़करे=narration/descrption]

मगर वो ज़ूद_फ़रामोश ज़ूद रन्ज भी है
के रूठ जाये अगर याद कुछ दिलाऊं उसे

वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ
तुम्हारी बात पे ऐ नासिहो गँवाऊँ उसे

जो हम_सफ़र सर-ए-मन्ज़िल बिछड़ रहा है 'फराज़'
अजब नहीं कि अगर याद भी ना आऊँ उसे

--अहमद फ़राज़

Source : http://urdupoetry.com/faraz29.html

Monday, October 10, 2011

के वो ख़्वाबों में भी लगती है, ख्यालों जैसी

ढूँढता फिरता हूँ यूं लोगों में सोहबत उसकी
के वो ख़्वाबों में भी लगती है, ख्यालों जैसी

--अहमद फराज़

Sunday, August 28, 2011

आप ही अपनी अदाओं पे ज़रा गौर करें फराज़

आप ही अपनी अदाओं पे ज़रा गौर करें फराज़
हम अगर अर्ज़ करेंगे, तो शिकायत होगी
--अहमद फराज़

तेरी बेरूखी का शिकवा मैं किस से करूँ फराज़

तेरी बेरूखी का शिकवा मैं किस से करूँ फराज़
यहाँ हर शक्स तुझे मेरा महबूब समझता है

--अहमद फ़राज़

ये बार बार जो आंखों को मल के देखते हैं

अभी कुछ और करिश्में गज़ल के देखते हैं
फ़राज़ अब ज़रा लहज़ा बदल के देखते हैं
तू सामने है, तो फिर क्यूँ यकीन नहीं आता
ये बार बार जो आंखों को मल के देखते हैं

--अहमद फ़राज़

सिर्फ़ चहरे की उदासी से भर आये आँसू फ़राज़

सिर्फ़ चहरे की उदासी से भर आये आँसू फ़राज़
दिल का आलम तो अभी आपने देखा ही नही

--अहमद फ़राज़

कुछ तो फ़राज़ हमने पलटने मे देर की

कुछ तो फ़राज़ हमने पलटने मे देर की
कुछ उसने इन्तज़ार ज़्यादा नहीं किया

--अहमद फ़राज़

हमने सोचा के दो चार दिन की बात होगी लेकिन

हमने सोचा के दो चार दिन की बात होगी लेकिन
तेरे ग़म से तो उम्र भर का रिश्ता निकल आया

--अहमद फ़राज़

हम इस गुरूर में रहते हैं कि हम अपनी ही चीज़ें मांगा नही करते

वो इस अना में रहते हैं कि हम उनको उन से मांगें फ़राज़
हम इस गुरूर में रहते हैं कि हम अपनी ही चीज़ें मांगा नही करते

--अहमद फ़राज़

सोचा था ये सवाल, न सोचा करेंगें हम

वो किस तरह मिला था, जुदा कैसे हो गया फ़राज़
सोचा था ये सवाल, न सोचा करेंगें हम

--अहमद फ़राज़

कुछ तो होता है मोहब्बत में जुनून का असर फ़राज़

कुछ तो होता है मोहब्बत में जुनून का असर फ़राज़
और कुछ लोग दीवाना बना देते हैं

--अहमद फ़राज़

यूँ ही इसे लोग मोहब्बत समझ बैठे फ़राज़

यूँ ही इसे लोग मोहब्बत समझ बैठे फ़राज़
वो शक्स मुझे जान से प्यारा है और बस


--अहमद फ़राज़

यूँ ही इसे लोग मोहब्बत समझ बैठे हैं फ़राज़

यूँ ही इसे लोग मोहब्बत समझ बैठे हैं फ़राज़
वो शक्स मुझे जान से प्यारा है और बस

--अहमद फराज़

Monday, July 25, 2011

मै और उसको भुला दूं , ये कैसी बातें करते हो फ़राज़

मै और उसको भुला दूं , ये कैसी बातें करते हो फ़राज़ .......!!!
सूरत तो फिर सूरत है वो नाम भी अच्छा लगता है ........!!!

--अहमद फराज़

Monday, May 16, 2011

तबदीली जब भी आती है, मौसम की अदाओं में

तबदीली जब भी आती है, मौसम की अदाओं में
किसी का यूं बदल जाना, बहुत याद आता है
--अहमद फराज़

Sunday, October 24, 2010

नादान है वो कितना कुछ समझता ही नही है फ़राज

नादान है वो कितना कुछ समझता ही नही है फ़राज

सीने से लगा के पूछता है कि धडकन तेज क्यो है ?

--अहमद फराज़