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Tuesday, November 5, 2013

पढ़ने वाले भी लेकिन बच्चे नही है

हाँ किरदार कहानी के सच्चे नही है
पढ़ने वाले भी लेकिन बच्चे नही है

जिसके दामन पे लगे वही जानता है
दाग कैसे भी लगे, अच्छे नही है

--अमोल सरोज

Friday, September 9, 2011

तेरी याद ही आखिरी सहारा थी

तेरी याद ही आखिरी सहारा थी
बडी भूल की तुझे भूल कर

--अमोल सहारन

Sunday, July 24, 2011

हम अकेले तो नहीं...

बस इसी बात पे, दिल को सुकूं आ जाता है
हम अकेले तो नहीं, जिसे कोई याद आता है

--अमोल सहारन

Monday, May 16, 2011

क्या सच में मर जाएँ उसे पाने की खातिर

अपने वादे पे यकीन दिलाने की खातिर
क्या सच में मर जाएँ उसे पाने की खातिर

--अमोल सहारन

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Monday, April 4, 2011

ये लड़का कब होगा सयाना क्या पता

मुझे मालूम है तेरे घर का पता
कहाँ है मेरा आशियाना क्या पता

ख़ुदकुशी ही कहीं दुश्वारियों का हल तो नहीं ?
ये इश्क ही न हो मौत का बहाना क्या पता

हर एक को राज़-ए-दिल बता देता है
ये लड़का कब होगा सयाना क्या पता

यु ही बेड के साथ हो लिए हम भी
किस की जीत का है जयकारा क्या पता !!

--अमोल सहारन

Monday, February 7, 2011

एक सुकून इस दिल को नसीब नहीं होता

एक सुकून इस दिल को नसीब नहीं होता
बाकी तो मोहब्बत में कुछ अजीब नहीं होता

हिज्र में तो आँखों में कट जाती थी रातें
सोना मगर वस्ल में भी नसीब नहीं होता

बहुत सुकून रहता है जिंदगी में
मोहब्बत में जब कोई भी रकीब नहीं होता

तेरा ख़याल आते ही मीर याद आ जाता है
तू पास होती है जब कोई भी करीब नहीं होता

--अमोल सहारन

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Sunday, January 9, 2011

वो अपनी मजबूरियाँ बता रहा था..

वो अपनी मजबूरियाँ बता रहा था..
मुझे लगा कि पीछा छुडा रहा था..

जेहन खो चुका था आँफिस की जी हजूरी मे
दिल अब तलक मुझे दिल्ली घुमा रहा था

उसे भुलाने की कोशिशे पलटवार कर गयी
भूला हुआ भी अब तो याद आ रहा था

तन्हाइयो मे ही गुजरी सब नाकामियाँ अपनी
अब हर कोई साथी अपना बता रहा था

भूला नही हूँ मै तेरी वो सौगाते
तुझसे मिला जख्म कई दिन हरा रहा था

--अमोल सहारन

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Friday, January 7, 2011

वो लड़की घरेलु थी, मैं लड़का आवारा था

दोनों के दिल टूटने का तगड़ा इशारा था
वो लड़की घरेलु थी, मैं लड़का आवारा था

मरने का दरिया बीच जाते किसलिए
डूबने को अपने काफी ये किनारा था

नाराज़गी दुनिया से गलत नहीं मेरी
वो भी नहीं मिला जो हक जायज़ हमारा था

दुःख झेल लिए सारे ख़्वाबों में ही हमने
जिंदगी में तो सदा दिलकश ही नज़ारा था

वक्त बदलने से फितरत नहीं बदलती
दिल आज भी नाकारा है, ये कल भी नाकारा था

--अमोल सहारन

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खामखाह तो नहीं मौत से डर रहा हूँ मैं..

खामखाह तो नहीं मौत से डर रहा हूँ मैं.....
कोई तो है जिसके लिए नहीं मर रहा हूँ मैं.....

उसे अपने किये पे शर्मिंदा न होना पड़े...
इसलिए ये जिन्दंगी बसर कर रहा हूँ मैं

उसे अपने फैसले पे अफ़सोस ना हो...
इसलिए कामयाबी से अपनी डर रहा हूँ मैं...

मरने की तम्मना बची न जीने की आरज़ू रही....
बेमन से दोनों ही काम कर रहा हूँ मैं.....

तेरे दीदार की इच्छा लिए फिरता हूँ आँखों में..
काम नाजायज है लेकिन कर रहा हूँ मैं..

थोड़ी ताज़ा बयार लगे तो रूह को सकूँ मिले..
कब से यादो के इस बंद कमरे में सड रहा हूँ मैं....

कुछ दिन भले लगे थे ये प्यार महोबत के नगमे...
अब फिराक को ही फिर से पढ़ रहा हूँ मैं....

कल तुझे भूलने का वादा किया था खुद से...
आज फिर उस वादे से मुकर रहा हूँ मैं...

वो मिलता तो जाने क्या करता....
उसके बिना तो शायरी कर रहा हूँ मैं....

कुछ लिहाज़ मेरा नहीं तो अपने माझी का ही कर ले..
कुछ दिन तो तेरा हमसफ़र रहा हूँ मैं...

लोग कहते है मैंने ख़ुदकुशी की है...
मुझे लगता है की तेरे हाथो मर रहा हूँ मैं......

तेरे बिना भी ये दिल्ली अच्छी लगने लगे....
एक नाकाम सी कोशिश फिर कर रहा हूँ मैं...

--अमोल सहारन

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Monday, January 3, 2011

मै उडा देता हूँ मजाक मे सँजिदगी

मै उडा देता हूँ मजाक मे सँजिदगी...
वो हो जाते है सँजीदा मेरे मजाक पे
--अमोल सहारन
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