Showing posts with label Aseem Qaumi. Show all posts
Showing posts with label Aseem Qaumi. Show all posts

Sunday, August 28, 2011

कितने मसरूफ सभी यार पुराने निकले

किस्सा-ए-दर्द ज़माने को सुनाने निकले
हम भी असीम की तरह कितने दीवाने निकले

उस के दर पर इसी उम्मीद पे बैठा हूँ फ़क़त
काश खैरात ही करने के बहाने निकले

मेरे दुःख दर्द को सुनने का नहीं वक़्त इन्हें
कितने मसरूफ सभी यार पुराने निकले

सारे कन्धों पे है ज़ंजीर-ए-गुलामी का वज़न
कौन गैरत का जनाज़े को उठाने निकले

ख्वाब में गम है खुली आँख से ये कौम मेरी
है यही वक़्त कोई इसको जगाने निकले

पर्दा-ए-गैब में बैठा है जो हादी असीम
उसको आवाज़ दो अब दीं बचाने निकले

--असीम कौमी

Sunday, August 22, 2010

इस शहर क लोगों से वफ़ा माँग रहा हूँ

इस शहर के लोगों से वफ़ा माँग रहा हूँ
और सोच मे डूबा हूँ के क्या माँग रहा हूँ

ये सब ने सज़ा रखा है जो अपनी जबीन पर
मैं दिल पे भी इक ऐसा निशाँ माँग रा हूँ

इस सूखे हुए खेत का जो रंग बदल दे
उस रहम की बारिश की दुआ माँग रा हूँ

पत्थर का तलबगार हूँ शीशे क नगर मे
क्या माँग रहा हूँ मैं कहाँ माँग रहा हूँ

तू बाँध के जुल्फों से मुझे दिल मे बिठा ले
मुजरिम हूँ तेरा तुझ से सज़ा माँग रहा हूँ

पहलू में तेरे सिर हो मेरा, मौत जब आए
बस इतना करम वक़्त-ए-नज़ा माँग रहा हूँ

मैं कौन हूँ, क्या हूँ, मैं यहाँ किस लिए आया
मैं खुद से खुद अपना ही पता माँग रहा हूँ

दो लफ्ज़ मेरे नाम भी लिख दे कभी "असीम"
मैं तुझ से वफाओं का सिला माँग रहा हूँ

--असीम कौमी

चल के थमती नहीं अश्कों की रवानी असीम

चल के थमती नहीं अश्कों की रवानी असीम
जब भी दोहराता ही तू अपनी कहानी असीम

अब तो ईमान ही नहीं लफ्ज़-इ-वफ़ा पे अपना
ऐसे हालात सुने तेरी जुबानी असीम 

तू ये कहता था कभी इश्क न करना यारो
हाय क्यों हम ने तेरी बात न मानी असीम

जिसका तू हो गया, ता-ज़िन्दगी उस का ही रहा
इश्क करने में नहीं ही तेरा सानी असीम

किसको इस दौर में फुर्सत ही सुनने बैठे
ले के फिर बैठ गया बात पुरानी असीम

गम-ए-दौरां ही बहुत ही हमें तडपाने को
तू न अब और बढ़ा ये परेशानी असीम

तुझसे अच्छे भी बहुत और सुखनवर हैं यहाँ
जा कहीं और दिखा शोला बयानी असीम

--असीम कौमी 

Sunday, July 5, 2009

जिस की खातिर हम हुए हैं बेखबर आराम से

जिस की खातिर हम हुए हैं बेखबर आराम से
हाये वो ज़ालिम पड़ा है सेज पर आराम से

भूल जाओ जो भी था अब तक हमारे दर्मियां
उस ने मुझ से कह दिया ये किस कदर आराम से

दिल के ज़ख्मों को भी भर देता है मरहम वक्त का
ज़ख्म भर जायेंगें अपने भी मगर आराम से

गिर के फिर उठना सम्भलना फिर सम्भलना कर दौड़ना
वक्त सिखलाता है ये सारे हुनर आराम से

अपने खून से अब यारी इस की करते जाइये
हां समर देगा उम्मीदों का शजर आराम से

काश मेरे हाथ में तु हाथ देता कभी
कट ही जाता ज़िन्दगी का ये सफर आराम से

शायरी में कह दिया देखा जो सफर-ए-ज़ीस्त में
कर दिया असीम ने किस्सा मुख्तसर आराम से

--असीम कौमी

Sunday, April 12, 2009

मेरे कूचे में कदम आप जो आ कर रखते

मेरे कूचे में कदम आप जो आ कर रखते
हम भी राहों में दिल-ओ-जान बिछा कर रखते

तुम अगर इतनी इजाज़त हमें दे देते कभी
तेरी तस्वीर को हम दिल में सजा कर रखते

काश इज़हार-ए-वफ़ा कर दिया होता हम ने
यूँ ना जज़बात को हम दिल में दबा कर रखते

हमें मालूम जो होता तेरी साज़िश का कभी
हम रक़ीबों से भी कुछ बात बना कर रखते

मेरे इस दिल की तड़प तुम ने जो समझी होती
तुम कभी यूँ ना मुझे दूर हटा कर रखते

मिल ही जाती जो खबर गर तेरे आने की हमें
हम तेरे वास्ते कुछ सांस बचा कर रखते

इन सज़ाओं का तो मालूम नही था वरना
रोज़-ए-मेहशर के लिये करम कमा कर रखते

काश हम होते सुखनवार कभी असीम जैसे
अपने शेरों से दर-ओ-बाम हिला कर रखते

--असीम कौमी