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Tuesday, November 26, 2013

हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

हादसे थे .…. कि हद से पार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

कुसूर इतना … कि सच कह दिया
जो कुछ था पता … सब कह दिया
गलती बस इतनी ... कि गलत नहीं किया
किसी पर भी ... हमने शक नहीं किया
अंजाम हुआ कि शक के दायरे में आ गए
अनकहे बयान हमारे .. चर्चे में आ गए

‘तर्क-ओ-दलील’ सारे तार तार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

पीड़ा पीड़ित की जाना ही नहीं कोई
टूटा है पहाड़ हमपे .. माना ही नहीं कोई
हँसती खिलखिलाती मासूम बेटी गंवा दी
हमने सारे जीवन की पूँजी गंवा दी
इल्ज़ाम ये है कि कुछ छुपा रहे है हम
क्या बचा है अब .. जो बचा रहे है हम

पल पल जिंदगी के .... उधार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

उम्मीद थी कि दुनिया ढाढस बंधाएगी
उबरने के इस गम के तरीके सुझायेगी
पर लोगो ने तो क्या क्या दास्ताँ गढ़ ली
जो लिखी न जाए, .. ऐसी कहानी पढ़ ली
मीडिया ने हमारे नाम की सुर्खिया चढ़ा ली
चैनलों ने भी लगे हाथ .... टीआरपी बढ़ा ली

अंदाज-ओ-अटकलों से रंगे अखबार हो गए
और हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

हँसती खेलती सी एक दुनिया थी हमारी
हम दो ..... और एक गुड़िया थी हमारी
दु:खों को खुशियों की खबर लग गई
जाने किस की नज़र लग गई
कुसूर ये जरूर कि हम जान नहीं पाए
शैतान हमारे बीच था, पहचान नहीं पाए
बगल कमरे में छटपटाती रही होगी
बचाने को लिए हमें बुलाती रही होगी
जाने किस नींद की आगोश में थे हम
खुली आँख ... फिर न होश में थे हम
ये ‘गुनाह’ हमारा ‘काबिल-ए-रहम’ नहीं है
पर मुनासिब नहीं कहना कि ... हमें गम नहीं है

खुद नज़र में अपनी .. शर्मसार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

पुलिस, मीडिया, अदालत से कोई गिला नहीं है
वो क्या कर रहे है ...... खुद उन्हें पता नहीं है
फजीहत से बचने को सबने .. फ़साने गढ़ दिए
इल्ज़ाम खुद की नाकामी के .. सर हमारे मढ़ दिए
‘अच्छा’ किसी को ... किसी को ‘बुरा’ बनाया गया
न मिला कोई तो हमें बलि का बकरा बनाया गया
असलीयत बेरहमी से मसल दी जाने लगी
फिर .. शक को सबूत की शकल दी जाने लगी

‘तथ्य’, .. ‘सत्य’ सारे निराधार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

सेक्स, वासना, भोग से क्यों उबर नहीं पाते
सीधी सरल बात क्यों हम कर नहीं पाते
बात अभी की नहीं ... हम अरसे से देखते है
हर घटना क्यों ... इसी चश्मे से देखते है
ईर्ष्या, हवस, बदले से भी ये काम हो सकते है
क़त्ल के लिए पहलू .. तमाम हो सकते है
जो मर गया उसे भी बख्शा नहीं गया
नज़र से अबतलक वो नक्शा नहीं गया
उम्र, रिश्ते, जज़्बात का लिहाज़ भी नहीं किया
कमाल ये कि .. किसी ने एतराज़ भी नहीं किया

कितने विकृत विषमय विचार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

इन घिनौने इल्जामों को झुठलाना ही होगा
सच मामले का ... सामने लाना ही होगा
वरना संतुलन समाज का बिगड़ जाएगा
बच्चा घर में .. माँ बाप से डर जाएगा
कैसे कोई बेटी .... माँ के आँचल में सिमटेगी
पिता से कैसे .. खिलौनों की खातिर मचलेगी
गर .. साबित हुआ इल्ज़ाम तो ये समाज सहम जाएगा
रिश्तों का टूट ... हर तिलस्म जाएगा

बेमाने सारे रिश्ते नाते .. परिवार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए



~ ~ ~ { ...... “तलवार दम्पति” के दर्द को समर्पित ....... } ~ ~ ~


--अमित हर्ष

Saturday, January 19, 2013

चलो अब फ़ैसला कर लें

चलो अब फ़ैसला कर लें
के इस रास्ते पे कितनी दूर जाना है?
मुझे तुमसे बिछडना है?
तुम्हें मुझ को भूलना है?
बहुत दिन तक
कभी साहिल की भीगी रेत पेर यूँ ही
तुम्हारा नाम लिखा है
कभी खुश्बू पे अश्कों से
कोई पैगाम लिखा है
कभी तन्हाई की वहशत में
दीवारों से बातें कीं
कभी छत पर टहल कर
चाँद से, तारों से बातें कीं
मगर ये इश्क़ की दीवानगी ठहरी
कोई हासिल नही जिस से
नदी के दो किनारों की तरह
हमराह चलने से
अलग ताक़ों में रखे
दो चिरागों की तरह एक साथ जलने से
भला किया फ़ायदा होगा
ये एक ऐसी मोहब्बत है
क जिस में क़ुरबत ओ फुरक़त का
या सोद-ओ-ज़ियाँ का
कोई भी लम्हा नहीं आता
सो इस बे-रब्त क़िस्से का
कोई अंजाम हो जाए
चलो अब फ़ैसला कर लें

[Humaira Rahat]

Monday, July 18, 2011

दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है

जब जब दर्द का बादल छाया
जब गम का साया लहराया
जब आँसू पलकों तक आया
जब यह तन्हा दिल घबराया
हमने दिल को ये समझाया
दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है
दुनिया में यूँही होता है

यह जो गहरे सन्नाटे हैं
वक़्त ने सबको ही बाँटे हैं
थोड़ा गम है सबका क़िस्सा
थोड़ी धूप है सबका हिस्सा
आँख तेरी बेकार ही नम है
हर पल एक नया मौसम है
क्यूँ तू ऐसे पल खोता है
दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है

--जावेद अख्तर

From Movie ZINDAGI NA MILEGI DOBARA

Sunday, May 1, 2011

गुलज़ार साहब कहते है न....

गुलज़ार साहब कहते है न....

काश तुम्हारे जाने पर
कुछ फर्क तो पड़ता जीने में
प्यास न लगती पानी की या ,नाखून बढ़ना बंद हो जाते
बाल हवा में न उड़ते या धुंआ निकलता सांसो से
सब कुछ वैसे ही चलता है ...
बस इतना फर्क पड़ा है मेरी रातो में
नींद नहीं आती तो अब सोने के लिए
इक नींद की गोली रोज़ निगलनी पड़ती है !

love is always beautiful......

Sunday, December 26, 2010

विधाता ने मुझको बनाया था जिस दिन

विधाता ने मुझको बनाया था जिस दिन
धरती पे भूंचाल आया था उस दिन
मुझे देख सूरज को गश आ गया था
मेरे रूप पर चाँद चकरा गया था
मैं तारीफ़ अपनी करूँ या खुदा की

एक था और एक थी,

एक था और एक थी,
था ने थी से मोहब्बत की
अफसाना हो गया
दुश्मन सारा ज़माना हो गया
गली गली उन दो नामो के चर्चे
और दीवार दीवार पर उन्ही दो नामो के पर्चे
थी बेचारी क्या करे
जिए के मरे
कह न सकी, रह न सकी

Sunday, May 16, 2010

आज दुल्हन के लाल जोड़े में

आज दुल्हन के लाल जोड़े में,
उसे उसकी सहेलियों ने सजाया होगा…

मेरी जान के गोरे हाथों पेर
सखियों ने मेहन्दी को लगाया होगा…

बहुत गहरा चढेगा मेहन्दी का रंग,
उस मेहन्दी में उसने मेरा नाम छुपाया होगा…

रह रह कर रो पड़ेगी
जब जब उसको ख़याल मेरा आया होगा…

खुद को देखगी जब आईने में,
तो अक्स उसको मेरा भी नज़र आया होगा…

लग रही होगी बला सी सुन्दर वो,
आज देख कर उसको चाँद भी शरमाया होगा

आज मेरी जान ने
अपने माँ बाप की इज़्ज़त को बचाया होगा

उसने बेटी होने का
दोस्तों आज हर फ़र्ज़ निभाया होगा

मजबूर होगी वो सबसे ज़्यादा,
सोचता हूँ किस तरह उसने खुद को समझाया होगा

अपने हाथों से उसने
हमारे प्रेम के खतों को जलाया होगा

खुद को मजबूत बना कर उसने
अपने दिल से मेरी यादों को मिटाया होगा

टूट जाएगी जान मेरी,
जब उसकी माँ ने तस्वीर को टेबल से हटाया होगा

हो जाएँगे लाल मेहन्दी वाले हाथ,
जब उन काँच के टुकड़ों को उसने उठाया होगा

भूखी होगी वो जानता हूँ में,
कुछ ना उस पगली ने मेरे बगैर खाया होगा

कैसे संभाला होगा खुदको
जब उसे फेरों के लिए बुलाया होगा

कांपता होगा जिस्म उसका,
हौले से पंडित ने हाथ उसका किसी और को पकड़ाया होगा

में तो मजबूर हूँ पता है उसे,
आज खुद को भी बेबस सा उसने पाया होगा

रो रो के बुरा हाल हो जाएगा उसका,
जब वक़्त उसकी विदाई का आया होगा

बड़े प्यार से मेरी जान को
मया बाप ने डॉली में बिताया होगा

रो पड़ेगी आत्मा भी
दिल भी चीखा ओर चीलाया होगा

आज अपने माँ बाप के लिए
उसने गला अपनी खुशियों का दबाया होगा

रह ना पाएगी जुदा होकेर मुझसे
डर है की ज़हर चुपके से उसने खाया होगा

डोली में बैठी इक ज़िंदा लाश को
चार कंधो पेर कहरों ने उठाया होगा

--अज्ञात

Source : http://www.shers.in/shayari/dard-bhari-shayari/aaj-dulhan-ke-laal-jode-mein-5990/

Wednesday, May 5, 2010

जाने एक नौजवान को क्या सनक चढ़ी...

जाने एक नौजवान को क्या सनक चढ़ी...
जाने थी क्या खुराफात उसने मन मे गढ़ी...
वो जोश मे उठा और तेज़ी से चलने लगा...
एक सज्जन का तेज़ी से पीछा करने लगा...

बेचारे सज्जन भी ये देखकर बड़ा घबराए...
अपने कदम थे उन्होने बड़ी तेज़ी से बढ़ाए...
उनके काँधे पे एक छोटा सा बैग लटका था...
बस उसी मे इस नौजवान का जी अटका था...

सज्जन बैग सीने से चिपकाए ज़ोर से भागे...
लगा शायद नौजवान से निकल गये आगे...
पर वो भी दुगनी रफ़्तार से दौड़ रहा था...
सज्जन का पीछा बिल्कुल न छोड़ रहा था...

सज्जन भागकर तब रेलवे स्टेशन पहुँचे...
बड़ी तेज़ी से थे प्लॅटफॉर्म की ओर लपके...
पर उसने अभी भी उनका पीछा ना छोड़ा...
वो भी उनके पीछे पीछे प्लॅटफॉर्म पे दौड़ा...

लोग तो बस खड़े खड़े तमाशा देख रहे थे...
ओलंपिक जैसी दौड़ से आँख सेंक रहे थे...
फिर पोलीस भी कहीं से सीन मे आई...
नौजवान को पकड़ा और लाठियाँ बजाई...

पर वो सज्जन अभी शायद नही थे थके...
वो तो बस दौड़ते ही रहे और नही रुके..
पोलीस को शक हुआ तो उन्हे भी रोका...
पर वो तो दे गये पोलीस को ही धोखा...

बैग फेंका और वो भीड़ मे कहीं खो गये...
फिर जाने कहाँ वो चुपचाप चंपत हो गये...
बैग खोला तो वहाँ खड़े सब गये सहम..
उसके अंदर रखा हुआ था एक टाइम बम...

फिर तुरंत वहाँ बम निरोधक दस्ता आया...
फिर उन्होने उस बम को फटने से बचाया...
फिर बात चली नौजवान उसी का साथी है...
हो ना हो ये भी ज़रूर कोई आतंकवादी है...


फिर चार लाठियों मे ही वो बिखर गया...
उसके खुलासे से हर कोई था सिहर गया...
बोला मैं कोई आतंकवादी नही सरकार...
मैं तो हूँ बस एक अदना सा बेरोज़गार...

जाने कबसे घर मे था चूल्हा नही जला...
कोशिश की तो पर कोई काम ना मिला....
ये सब मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था..
इसलिए एक कोने मे बैठा रो रहा था...

फिर मैने उसे बम रखते हुए देख लिया...
इसीलिए मैं उसके पीछे पीछे हो लिया...
सोचा था कहीं न कहीं तो ये बम फूटेगा...
बस बेरोज़गारी से वही मेरा दामन छूटेगा...

इसके धमाके मे चुपचाप मरने चला था...
परिवार के लिए आज कुछ करने चला था...
मरता तो सरकार से पैसे ही मिल जाते....
मेरे मरने से परिवार के दिन फिर जाते....

--दिलीप तिवारी

E-mail : dileep.tiwari8@gmail.com

Monday, March 29, 2010

तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो...

किसी ने चाहा था लड़कपन में तुमको
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो
मन ही मन अपना बनाया था तुमको
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो

उसे न आता था प्यार जताना
उसे न आता था तुमको मनाना
इसलिए शायद सताया था तुमको
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो

दिल ही दिल में अपने ख्वाब बुनता था
सपनो को कलियाँ तेरे लिए चुनता था
कभी न लेकिन बताया था तुमको
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो

रातों को उठकर बिस्तर से जागता था
वो तुम्हे चाहता था तुम्हे मांगता था
दुनिया से रूठकर भी मनाया था तुमको
तुम्हे तो शायद याद भी न हो

सोचता था क्या होगा अंजाम मेरा
कोपियों पे लिखता था वो नाम तेरा
किताबों मेंफूल सा सजाया था तुमको
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो

पीछे कि सीट से क्लास में बैठकर
प्यार से वो तुमको देखता था अक्सर
चाहा मगर गले से लगा न पाया तुमको
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो

बचपन कि वो यादें अब भी आती है
बैचैन करती हैं मुजको रुलाती हैं
सोचा बहत ''तोमर'' भुला न पाया तुमको
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो....
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो...
तुम्हे तो शायद अब याद भी न हो...

डॉ. विकास तोमर.

Sunday, January 17, 2010

मेरी रुह निकलने वाली होगी

मेरी रूह निकलने वाली होगी
मेरी सांस बिखरने वाली होगी
फ़िर दामन जिंदगी का छूटेगा
धागा सांस का भी टूटेगा
फ़िर वापस हम ना आयेंगे
फ़िर हमसे कोइ ना रूठेगा
फ़िर आंखों मे नूर ना होगा
फ़िर दिल गम से चूर ना होगा
उस पल तुम हमको थामोगे
हम सा दोस्त अपना फ़िर मांगोगे
फ़िर हम ना कुछ भी बोलेंगे
और आंखें भी ना खोलेंगे
उस पल तुम रो दोगे
और दोस्त अपना खो दोगे, दोस्त अपना खो दोगे

--अज्ञात

Thursday, January 7, 2010

नादान बचपन

कागज़ की कश्ती थी
पानी का किनारा था
खेलने की मस्ती थी
दिल ये आवारा था
कहां आ गया,
समझदारी के दलदल में
वो नादान बचपन ही कितना प्यारा था

--अज्ञात

Wednesday, January 6, 2010

Cigarette

Ravi Noor Singh : A brand new composition which highlights the merits and de-merits of smoking
I don’t smoke but this composition is a mixture of my imagination and observations J
I hope it’ll be liked by smokers as well as non-smokers.

ikk saah andar nu bhar layiye,
ik saah baahr nu chhad-de aa'n,
ikk agg sive di machdi ae,
dhuyein da chhalla kadh-de aa'n..

Saroor jeha sir chadh janda,
jannat da hulaara aa janda,
jad ik vi kashsh lga layiye,
sach pucho nazaara aa janda

kyun kehnde isnu cheez buri,
kyun naam hoyeya badnam eda,
kyun gamm ne isnu gal layeya
kyun sathi baneya jaam eda

ki dosh bedoshi cigarette da,
jo dhuyein naal hai fukk jandi,
do pal dukhaan ton door kare,
saroor chadhaake mukk jandi..

ik nasha ajab iss cigarette da,
ki kehna edi khumari da
jad kalla koi mehsus kre,
eh farz nibhaundi yaari da.

aj kal de chandre daur andar,
insaan insaa'n da wairi ae'
fir har pal jehri saath rahe..
kyun kehnde ne eh zehri ae'

Cigarette speaks…

main hikk te fatt lawaundi haan
par dil de fatt mukaundi haan
main apni agg de sek tale,
har gamm nu khaak banaundi haan..

main raunak tere mukhde di,
farh lainay unglaan do karke
saah raahi'n dil wich wass jaavan
tere bullaa'n nu chhoh karke

main sulag sulag ke sarh jandi,
par seene aggaan laa jaavan,
oh mud mud mainu hi loche,
aisa koi jaam pila jaavan

mera jeewan tera mukh sajna,
meri maut hai ash tray de wich
main balke ban swaah jana,
te mil jana fir kheh de wich

shahukaraan di shohrat haan
par surat meri hai saadi,
mere ishq ch yaaro na paina
mere palle bas hai barbaadi

mere ishq ch yaaro na paina
mere palle bas hai barbaadi…

-Noor


Couldn't type it in Punjabi, so sharing it as I got it from Ravi Noor. :)

Sunday, October 4, 2009

कुछ सवाल जवाब हवाओं से…

हमने हवाओं से कहा, जा देखकर आ
मेरा यार मेरी याद में रोता होगा
वो बोली वो तेरी तरह नहीं
जो अश्कों से दामन भिगोता होगा

हमने कहा आंसू न सही,
पर होंठों पर मेरा नाम है
वो बोली तेरा यार बड़ा मसरूफ है
और उसके लिये ये फिज़ूल का काम है

हमने कहा बातों में न सही मगर
दिल में तो वो हमें याद करता होगा
वो बोली कि हर कोई दीवाना नहीं
कि तेरी तरह वक्त बर्बाद करता होगा

हमने कहा, तुम झूठे हो
ऐसी बातों से हमें बहला न पाओगे
वो बोली कि मैं एक ज़रूरत हूँ
मेरे बिना जी न पाओगे

हम बोले कि ऐसी सांसों का हम क्या करें
जिसमें प्यार का मेरे सहारा नहीं
तू न भी मिले मुझे ग़म नहीं
मगर यार के बिना जीना गवारा नहीं

--अज्ञात

सोमवार को आंख लड़ी थी

सोमवार को आंख लड़ी थी
मंगल को बीमार हो गया
बुधवार को दिल दे बैठा
ब्रहस्पति को दीदार हो गया
शुक्रवार को वो भी हस दी
शनिवार को प्यार हो गया
पर SUNDAY की छुट्टी पड़ गयी
सब कुछ बंटा धार हो गया

--गिरिधर व्यास


गिरिधर व्यास, हास्य व्यंग के महान कवि