आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है
भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है
आज क्या बात है के फूलों का
रन्ग तेरी हँसी से मिलता है
मिल के भी जो कभी नहीं मिलता
टूट कर दिल उसी से मिलता है
कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं
होश जब बेख़ुदी से मिलता है
जिगर मोरादाबादी
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Sunday, January 15, 2012
दिल मगर कम किसी से मिलता है
Sunday, December 12, 2010
हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं,
हमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नही
--जिगर मोरादाबादी
Tuesday, December 7, 2010
आदमी आदमी से मिलता है
आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है
भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है
आज क्या बात है के फूलों का
रन्ग तेरी हँसी से मिलता है
मिल के भी जो कभी नहीं मिलता
टूट कर दिल उसी से मिलता है
कार-ओ-बार-ए-जहाँ सँवरते हैं
होश जब बेख़ुदी से मिलता है
--जिगर मोरादाबदी
Source : http://www.urdupoetry.com/jigar37.html
Thursday, August 12, 2010
हर तरफ छा गए पैगाम-ऐ-मोहब्बत बनकर...
हर तरफ छा गए पैगाम-ऐ-मोहब्बत बनकर...
मुझसे अच्छी रही किस्मत मेरे अफ़साने की...
--जिगर मोरादाबादी
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