गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो
आंधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा
--कैफ भोपाली
If you know, the author of any of the posts here which is posted as Anonymous.
Please let me know along with the source if possible.
Showing posts with label कैफ भोपाली. Show all posts
Showing posts with label कैफ भोपाली. Show all posts
Monday, May 4, 2009
तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है
तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है
आग का क्या है, पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है
सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हंसता चेहरा एक बहाना लगता है
--कैफ भोपाली
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है
तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है
आग का क्या है, पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है
सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हंसता चेहरा एक बहाना लगता है
--कैफ भोपाली
Sunday, May 3, 2009
दाग़ दुनिया ने दिये, ज़ख्म ज़माने से मिले
दाग़ दुनिया ने दिये, ज़ख्म ज़माने से मिले
हम को ये तोहफ़े तुम्हें दोस्त बनाने से मिले
हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले
खुद से मिल जाते तो चाहत क भ्रम रह जाता
क्या मिले आप जो लोगों के मिलाने से मिले
कैसे माने के उन्हें भूल गया तु ऐ कैफ
उन के खत आज हमें तेरे सरहाने से मिले
--कैफ भोपाली
हम को ये तोहफ़े तुम्हें दोस्त बनाने से मिले
हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले
खुद से मिल जाते तो चाहत क भ्रम रह जाता
क्या मिले आप जो लोगों के मिलाने से मिले
कैसे माने के उन्हें भूल गया तु ऐ कैफ
उन के खत आज हमें तेरे सरहाने से मिले
--कैफ भोपाली
Subscribe to:
Posts (Atom)