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Monday, May 4, 2009

गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो

गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो
आंधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा
--कैफ भोपाली

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है

तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है

आग का क्या है, पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है

सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हंसता चेहरा एक बहाना लगता है

--कैफ भोपाली

Sunday, May 3, 2009

दाग़ दुनिया ने दिये, ज़ख्म ज़माने से मिले

दाग़ दुनिया ने दिये, ज़ख्म ज़माने से मिले
हम को ये तोहफ़े तुम्हें दोस्त बनाने से मिले

हम तरसते ही तरसते ही तरसते ही रहे
वो फ़लाने से फ़लाने से फ़लाने से मिले

खुद से मिल जाते तो चाहत क भ्रम रह जाता
क्या मिले आप जो लोगों के मिलाने से मिले

कैसे माने के उन्हें भूल गया तु ऐ कैफ
उन के खत आज हमें तेरे सरहाने से मिले

--कैफ भोपाली