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Monday, October 17, 2022

और वो आँखों से ग़ज़ल कह गए

हम अल्फाज़ों को ढूंढते रह गए
और वो आँखों से ग़ज़ल कह गए
--राहत इन्दोरी 

Monday, December 15, 2014

तो फिर यकीन की हद से भरम निकल जाए

तो फिर यकीन की हद से भरम निकल जाए

हवा न हो तो चरागों का दम निकल जाए

राहत इन्दोरी

Sunday, March 18, 2012

आंधी से कोई कह दे कि औकात में रहे

सूरज , सितारे , चाँद मेरे साथ में रहे
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे
और शाखों जो टूट जाये वो पत्ते नही है हम
आंधी से कोई कह दे कि औकात में रहे
--राहत इंदोरी

Sunday, March 4, 2012

और मैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दिया

एक एक लव्ज़ का मफ़हूम बदल रखा है
आज से हमने तेरा नाम गज़ल रखा है

और मैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दिया
मेरे कमरे में भी एक ताजमहल रखा है

--राहत इंदोरी

Saturday, November 12, 2011

किसी ने ज़हर कहा है, किसी ने शहद कहा,

किसी ने ज़हर कहा है, किसी ने शहद कहा,
कोई समझ ही नहीं पाता है, ज़ायका मेरा
--राहत इंदोरी

Sunday, September 4, 2011

रवायतोँ की सफेँ तोड़कर बढ़ो वरना

रवायतोँ की सफेँ तोड़कर बढ़ो वरना
जो तुमसे आगे हैँ वो रास्ता नहीँ देँगे

--राहत इंदोरी

सफेँ=कतारेँ

Monday, February 28, 2011

रे जोगी

तू शब्दों का दास रे जोगी
तेरा कहाँ विश्वास रे जोगी

इक दिन विष का प्याला पी जा
फिर न लगेगी प्यास रे जोगी

ये सांसों का का बन्दी जीवन
किसको आया रास रे जोगी

विधवा हो गई सारी नगरी
कौन चला वनवास रे जोगी

पुर आई थी मन की नदिया
बह गए सब एहसास रे जोगी

इक पल के सुख की क्या क़ीमत
दुख हैं बारह मास रे जोगी

बस्ती पीछा कब छोड़ेगी
लाख धरे सन्यास रे जोगी

--राहत इन्दौरी

Sunday, May 16, 2010

मगर ये सच है कि उम्मीद्वार मैं भी हूँ

वो एक तीर है जिसका शिकार मैं भी हूँ
मैं एक हर्फ़ सही दिल के पार मैं भी हूँ

वो सामने रहा दरिया का दूसरा साहिल
अगर जहाज़ न डूबा तो पार मैं भी हूँ

यहाँ तो मौत का सैलाब आता रहता है
बहुत बचा था, मगर अब कि बार मैं भी हूँ

न जाने किसके मुकद्दर में वो लिखा होगा
मगर ये सच है कि उम्मीद्वार मैं भी हूँ

किसे खबर है कि नीले समन्दरों की तरह
बहुत दिनों से बहुत बेकरार मैं भी हूँ

--राहत इंदोरी

Saturday, March 13, 2010

मैं साँसे भी लुटा सकता हूँ

मैं साँसे भी लुटा सकता हूँ उसके लिए मगर
वो मेरे हर वादे को सरकारी समझती है
--राहत इंदोरी

Wednesday, September 23, 2009

थोड़ी है

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है
सदाक़त=Authenticity, Truth

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
मसनद=Throne

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

--राहत इंदोरी


Source : http://www.fundoozone.com/forums/showthread.php?t=20695

Sunday, August 2, 2009

ना तार्रूफ ना ताल्लुक है

ना तार्रूफ ना ताल्लुक है, मगर दिल अक्सर
नाम सुनता है तुम्हारा उछल पड़ता है

--राहत इंदोरी

Saturday, July 11, 2009

रोज़ तारों की नुमाईश में खलल पड़ता है

रोज़ तारों की नुमाईश में खलल पड़ता है
चांद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है
उनकी याद आई है, सांसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में खलल पड़ता है
--राहत इंदोरी

Wednesday, March 11, 2009

sharaab chhoR di tumne, kamaal hai Thakur

शराब छोड़ दी तुमने ,कमाल है ठाकुर
मगर ये हाथ में क्या लाल लाल है ठाकुर

किसी गरीब दुपट्टे का कर्ज़ है इस पर ,
तुम्हारे पास जो रेशम कि शाल है ठाकुर

तुम्हारी लाल हवेली छुपा न पाएगी ,
हमे ख़बर है कहाँ कितना माल है ठाकुर

दुआ को नन्हे गुलाबों ने हाथ उठाये है,
बस अब यहाँ से तुम्हारा जवाल है ठाकुर

--राहत इंदोरी