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Tuesday, June 12, 2012

दुनिया को बता देते की मोहब्बत क्या है

पहले तमन्ना तहसीन पाने की थी
सबसे अलग भीड़ में नज़र आने की थी
[तहसीन=praise/applause]

नए इन्कलाबों के नए कायदे थे
होड़ लगी उंगलियां उठाने की थी
[इन्कलाबी=revolutionary]

रौशनी का सबब तो बनना था हर किसी को
पर किसकी औकात सूरज सा जल पाने की थी
[सबब=cause/source]

यहाँ से तालीम पाने के बाद औरों की तरह
उसकी तमन्ना भी मुल्क छोड़ जाने की थी

जब हम अलग हैं तो औरों से मुकाबला क्यूं
शर्त खुद ही से आगे निकल जाने की थी

'मिश्रा' दुनिया को बता देते की मोहब्बत क्या है
गर तोड़ पाते जो बंदिश ज़माने की थी

--अभिषेक मिश्रा

Tuesday, April 3, 2012

इश्क किसी से करते हैं और किसी से निकाह करते हैं

अपनी ज़िंदगी को इश्क में फनाह करते हैं
कुछ लोग आज भी इश्क बेवजाह करते हैं

मुझे चाहने वाले अक्सर रूठ जाते हैं मुझसे
हम सच बोलते हैं यही गुनाह करते हैं

अजीब दौर चला है सुना है कि अब लोग
इश्क किसी से करते हैं और किसी से निकाह करते हैं

--अभिषेक मिश्रा

Saturday, November 5, 2011

वो हर किसी को मुस्कुरा के देखते हैं

आज सारे चराग बुझा के देखते हैं
ज़िंदगी तुझे और पास आ के देखते हैं

अमावसों की रात गर देखना हो चाँद
हम उन्हें छत पे बुला के देखते हैं

मेरी रुखसती पे ये कैसी बेचैनी है उनको
मुझे जो जीने पे आ आ के देखते हैं

जब खुल के की बात, तो शरमा गयी वो
चलो आज खुद ही शरमा के देखते हैं

ये इश्क की कसौटी कोई आसान नहीं प्यारे
परवाने खुद को जला के देखते हैं

तू आशिक न सही बीमार समझ ही इनायत कर दे
हम इक बार ज़ोर से कराह के देखते हैं

उन्हें पसंद हैं आप, ये ग़लतफहमी ठीक नहीं
वो हर किसी को मुस्कुरा के देखते हैं

दुनिया भर के अफकारों से सुकून नहीं पाया
चलो आज माँ के पाँव दबा के देखते हैं

गर बेरुखी ही है अंजाम-ए-दोस्ती
फिर आज किसी दुश्मन से हाथ मिला के देखते हैं

हम गिरे तो क्या उनकी औकात तो नहीं बदली
देखो वो अब भी 'मिश्रा' को सर झुका के देखते हैं

--अभिषेक मिश्रा

Tuesday, August 24, 2010

तो जब अब टूट के रो नहीं पाते ...तो खुल के हस लिया करते हैं

जज्बातों के बादल अब गरजते नहीं बस. बरस लिया करते हैं
बिखरती ज़िन्दगी को नए हौंसले से हम कस लिया करते हैं
अश्क बहें चुके हैं इतने कि अब पथरा सी गयी हैं आँखें मेरी
तो जब अब टूट के रो नहीं पाते तो खुल के हस लिया करते हैं

--अभिषेक मिश्रा 

मुझे माँ का आँचल दे दो, मुझे उसी में सुकूं मिलता है

किसी को हाथों के हुनर, किसी को खून में जुनूं मिलता है
मुझे माँ का आँचल दे दो, मुझे उसी में सुकूं मिलता है
--अभिषेक मिश्रा

मुझे दिल-फेक आशिक न समझना

हमेशा के लिए दर्ज हो जाये..ज़ेहन में ऐसा तो कोई नाम नहीं आता
दिल किसी न किसी पे तो आएगा इसे और कोई काम नहीं आता
सुनो मुझे दिल-फेक आशिक न समझना तुम बीमार हूँ मैं
क्या करूँ दवा कुछ देर में बदल देता हूँ गर आराम नहीं आता
--अभिषेक मिश्रा