ज़मीन से पहले, खुले आसमान से पहले
न जाने क्या था यहाँ इस जहाँ से पहले
हमें भी, रोज ही मरना है, मौत आने तक
हमें भी ज़िंदगी देनी है, जान से पहले
ख़याल आते ही मंजिल से अपनी दूरी का
मैं थक सा जाता हूँ अक्सर थकान से पहले
जो मेरे दिल में है, उसके भी दिल में है, लेकिन
वो चाहता है, कहूँ मैं.... ज़बान से पहले
हमें पता है, हमारा जो हश्र होना है
नतीजा जानते हैं, इम्तिहान से पहले
--राजेश रेड्डी
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Saturday, January 19, 2013
नतीजा जानते हैं, इम्तिहान से पहले
Wednesday, August 18, 2010
पानी बदलो.....ज़रा हवा बदलो
पानी बदलो.....ज़रा हवा बदलो
ज़िंदगानी की..... ये फ़िज़ा बदलो
कह रही है ये....... दूर से मंज़िल;
काफिले वालो!... रहनुमा बदलो.
तुमको..... जीना है इस जहाँ में..... अगर;
अपने जीने का...... फलसफा बदलो.
आँधियाँ...... तो.... बदलने वाली नहीं;
तुम ही....... बुझता हुआ दिया बदलो
मुस्कुराहट ........मिला के थोड़ी सी
अपने अश्कों का....... ज़ायक़ा बदलो
सारी दुनिया..... बदल गयी कितनी
तुम भी .....राजेश!... अब ज़रा बदलो...
--राजेश रेडी
Wednesday, February 17, 2010
एक दूसरे से सब यहाँ बेज़ार हो गए
एक दूसरे से सब यहाँ बेज़ार हो गए
रिश्तों के जितने फूल थे सब खार हो गए
निकले हिन् फिर बचाने वो मज़हब की आबरू
फिर एक नए फसाद के आसार हो गए
कल तक जो घर थे, गाँव थे, शहर थे
सब देखते ही देखते बाज़ार हो गए
बेचा जिन्होंने अपना ज़मीर इस जहाँ में वो
दुनिया कि हर खुशी के खरीददार हो गए
मंजिल हमारे सामने थे मुन्तज़र मगर
हम खुद ही अपनी राह में दीवार हो गए
--राजेश रेड्डी
रिश्तों के जितने फूल थे सब खार हो गए
निकले हिन् फिर बचाने वो मज़हब की आबरू
फिर एक नए फसाद के आसार हो गए
कल तक जो घर थे, गाँव थे, शहर थे
सब देखते ही देखते बाज़ार हो गए
बेचा जिन्होंने अपना ज़मीर इस जहाँ में वो
दुनिया कि हर खुशी के खरीददार हो गए
मंजिल हमारे सामने थे मुन्तज़र मगर
हम खुद ही अपनी राह में दीवार हो गए
--राजेश रेड्डी
Saturday, December 26, 2009
मुमकिन है, ज़िन्दगी का ये अन्दाज़-ए-इश्क़ हो
मुमकिन है, ज़िन्दगी का ये अन्दाज़-ए-इश्क़ हो
तु उसकी बेरुखी में कभी डूब के तो देख
--राजेश रेड्डी
तु उसकी बेरुखी में कभी डूब के तो देख
--राजेश रेड्डी
Thursday, November 26, 2009
बस एक सादा सा कागज़, ना कोई लव्ज़ ना कोई फूल
बस एक सादा सा कागज़, ना कोई लव्ज़ ना कोई फूल
अज़ब ज़ुबान में इस बार खत लिखा उसने
--राजेश रेड्डी
अज़ब ज़ुबान में इस बार खत लिखा उसने
--राजेश रेड्डी
Sunday, August 16, 2009
शाम को जिस वक़्त
शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
--राजेश रेड्डी
Source : http://aajkeeghazal.blogspot.com/2009/08/blog-post_14.html
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं
--राजेश रेड्डी
Source : http://aajkeeghazal.blogspot.com/2009/08/blog-post_14.html
रोज़ सवेरे दिन का निकलना
रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है
तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए
सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है
जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा
फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है
बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था
एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है
तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है
--राजेश रेड्डी
Source : http://aajkeeghazal.blogspot.com/2009/08/blog-post_14.html
शायर का पता-

राजेश रेड्डी
ए-403, सिल्वर मिस्ट, अमरनाथ टॉवर के पास,
सात बंगला, अंधेरी (प.) मुबंई - 61
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है
तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए
सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है
जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा
फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है
बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था
एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है
तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है
--राजेश रेड्डी
Source : http://aajkeeghazal.blogspot.com/2009/08/blog-post_14.html
शायर का पता-

राजेश रेड्डी
ए-403, सिल्वर मिस्ट, अमरनाथ टॉवर के पास,
सात बंगला, अंधेरी (प.) मुबंई - 61
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