भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे
हम आंसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे
हमीं ने कर दिया एलान-ए-गुमराही वरना
हमारे पीछे बहुत लोग आने वाले थे
इन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था, कि मेरे थे
ये अश्क कौन से ऊंचे घराने वाले थे
उन्हें करीब न होने दिया कभी मैंने
जो दोस्ती में हदें भूल जाने वाले थे
मैं जिनको जान के पहचान भी नहीं सकता
कुछ ऐसे लोग, मेरा घर जलाने वाले थे
हमारा अलमिया ये था, की हमसफ़र भी हमें
वही मिले, जो बहुत याद आने वाले थे
[अलमिया=विडम्बना]
"वसीम" कैसी ताल्लुक की राह थी जिसमें
वही मिले जो बहुत दिल दुखाने वाले थे
--वसीम बरेलवी
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Saturday, January 19, 2013
ये अश्क कौन से ऊंचे घराने वाले थे
Monday, June 25, 2012
किसी को छोड़ना हो तो मुलाकातें बड़ी करना
दियो का कद घटाने के लिए रातें बड़ी करना ,
बड़े शेहरो में रहना हो तो बातें बड़ी करना
मोहब्बत में बिछड़ने का हुनर सबको नहीं आता ,
किसी को छोड़ना हो तो फिर मुलाकातें बड़ी करना
--वसीम बरेलवी
Sunday, December 11, 2011
मैं इस उम्मीद में डूबा कि तू बचा लेगा
मैं इस उम्मीद में डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा
ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा
मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा
कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा
हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वह जब चाहेगा बुला लेगा
मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
लकीरें हाथ की अपने वह सब जला लेगा
--वसीम बरेलवी
A different version of this gazal is available at
http://aligarians.com/2006/02/main-is-ummiid-pe-duubaa-ke-tuu-bachaa-legaa/
Monday, November 7, 2011
भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का
इरादा छोड़ दिया उसने हदों से जुड़ जाने का
ज़माना है, ज़माने की निगाहों में न आने का
कहाँ की दोस्ती, किन दोस्तों की बात करते हो
मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का
निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया
भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का
ये मैं ही था बचा के खुद को ले आया किनारे तक
समंदर ने बहुत मौका दिया था डूब जाने का
--वसीम बरेलवी
Sunday, June 5, 2011
मुसीबतों से उभरती है शक्सियत यारो
मुसीबतों से उभरती है शक्सियत यारो
जो पत्थरों से न उलझे वो आइना क्या है
--वसीम बरेलवी
Sunday, May 8, 2011
उसने यूं बाँध लिया खुद को नए रिश्तों में
मेरी आँखों को ये सब कौन बताने देगा
ख़्वाब जिसके हैं, वही नींद न आने देगा
उसने यूं बाँध लिया खुद को नए रिश्तों में
जैसे मुझ पर, कोई इलज़ाम ना आने देगा
सब अंधेरों से कोई वादा किये बैठे हैं
कौन ऐसे में मुझे शम्मा जलाने देगा
भीगी झील, कँवल, बाग, महक, सन्नाटा
ये मेरा गाँव मुझे शहर न जाने देगा
वो भी आँखों में कईं ख़्वाब लिए बैठा है
ये तसव्वुर ही कभी नींद न आने देगा
अब तो हालात से समझौता ही कर लीजे वसीम
कौन माज़ी की तरफ लौट के जाने देगा
--वसीम बरेलवी
Sunday, May 16, 2010
नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया
नहीं कि अपना ज़माना भी तो नहीं आया
हमें किसी से निभाना भी तो नहीं आया
जला के रख लिया हाथों के साथ दामन तक
तुम्हें चराग बुझाना भी तो नहीं आया
नये मकान बनाए तो फासलों की तरह
हमें ये शहर बसाना भी तो नहीं आया
वो पूछता था मेरी आँख भीगने का सबब
मुझे बहाना बनाना भी तो नहीं आया
वसीम देखना मुड मुड के वो उसी की तरफ
किसी को छोड़ के जाना भी तो नहीं आया
--वसीम बरेलवी
Thursday, April 29, 2010
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी
ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं,
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी.
--वसीम बरेलवी
Monday, March 22, 2010
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले
उसे समझने का कोई तो सिल_सिला निकले
किताब-ए-माज़ी के पन्ने उलट के देख ज़रा
ना जाने कौन सा सफ़ाह मुड़ा हुआ निकले
जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है
उसी के बारे में सोचो तो फ़ासला निकले
--वसीम बरेलवी
Source : http://www.urdupoetry.com/wbarelvi05.html
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी कि मुताबिक नज़र आयें कैसे
घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे
क़ह-क़हा आँख की बरताव बदल देता है
हँसनेवाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे
कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे
--वसीम बरेलवी
Source : http://www.urdupoetry.com/wbarelvi02.html
हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ
हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ
आया पलको पे तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ
उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी ,
कौन कहता है की मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ
नयी कालोनी में बच्चों की ज़िदे ले तो गईं ,
बाप दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ
जा, हमेशा को मुझे छोड़ के जाने वाले ,
तुझ से हर लम्हा बिछड़ने का तो डर ख़त्म हुआ
--वसीम बरेलवी
Tuesday, January 26, 2010
बुझते हैं तो बुझ जाए कोई गम नहीं करते
हम अपने चारागो की लौ को कम नहीं करते
--वसीम बरेलवी
Sunday, January 17, 2010
कहाँ कतरे की गमख्वारी करे है
समंदर है अदाकारी करे है
कोई माने, न माने उसकी मरजी
मगर वो हुक्म तो जारी करे है
नहीं लम्हा भी जिसकी दस्तरस में
वही सदियों की तैयारी करे है
बड़े आदर्श है बातों में लेकिन
वो सारे काम बाजारी करे है
हमारी बात भी आये तो जानें
वो बातें तो बहुत सारी करे है
यही अखबार की सुर्खी बनेगी
ज़रा सा काम चिंगारी करे है
बुलावा आएगा चल देंगे हम भी
सफर की कौन तैयारी करे है
--वसीम बरेलवी
गमख्वारी=sympathy;
दस्तरस=reach
Saturday, June 20, 2009
वो कहां जाता किसे कोई सफ़ाई देता
अपने आगे जिसे कुछ भी ना दिखाई देता
वो कोई जज़्बा समझने ही को तैयार नहीं
मैं कहां तक उसे रिश्तों की दुहाई देता
एक अनदेखे सफ़र पर ही निकलना होगा
प्यार में रास्ता होता तो दिखाई देता
घर से निकला हूं कि दिन जीत के अब लौटूँगा
रात आती तो यही ख्वाब दिखाई देता
किस तरह घर के बडे शहर जलाने निकले
काश बच्चों को ये मंज़र ना दिखाई देता
तुझसे हट कर मैं किसे देखता तेरे जैसा
कोई अन्दाज़ किसी में तो दिखाई देता
रौशनी देगा मेरे घर को कहां ऐसा चिराग़
तेरे चेहरे की बदौलत जो दिखाई देता
वसीम बरेलवी