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Sunday, July 12, 2009

कौन कहता है मोहब्बत की ज़ुबाँ होती है

कौन कहता है मोहब्बत की ज़ुबाँ होती है
ये हक़ीक़त तो निगाहों से बयाँ होती है

वो ना आये तो सताती है ख़लिश सी दिल को
वो जो आये तो ख़लिश और जवाँ होती है

रूह को शाद करे दिल को जो पुरनूर करे
हर नज़ारे में ये तंवीर कहाँ होती है

ज़ब्त-ए-सैलाब-ए-मोहब्बत को कहाँ तक रोके
दिल में जो बात हो आँखों से अयाँ होती है

ज़िन्दगी एक सुलगती सी चिता है "साहिर"
शोला बनती है ना ये भुज के धुआँ होती है

--साहिर होशियारपुरी


Source : http://www.urdupoetry.com/shoshiarpuri01.html