कभी दीवार कभी दर की बात करता था
वो अपने उजड़े हुए घर की बात करता था
मैं ज़िक्र जब कभी करता था आसमानों का;
वो अपने टूटे हुए पर की बात करता था
ना थी लकीर कोई उसके हाथ पर यारों
वो फिर भी अपने मुक़द्दर की बात करता था
जो एक हिरनी को जंगल में कर गया घायल
हर इक शजर उसी नश्तर की बात करता था
बस एक अश्क था मेरी उदास आँखों में
जो मुझसे सात समंदर की बात करता था
--ज्ञान प्रकाश विवेक
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Monday, August 9, 2010
कभी दीवार कभी दर की बात करता था
Sunday, July 19, 2009
करिश्मे खूब मेरा जान-निसार करता था
करिश्मे खूब मेरा जान-निसार करता था
मिला के हाथ वो पीछे से वार करता था
वो जब भी ठोकता था कील मेरे सीने में
बड़ी अदा से उसे आर-पार करता था
सितारे तोड़ के लाया नहीं कोई अब तक
कि इस फ़रेब पे वो ऐतबार करता था
उसे पता था कि जीवन सफ़ेद चादर है
ना जाने क्यूं वो उसे दागदार करता था
कुछ इस लिये भी मुझे उसकी बात चुभती थी
कि वो ज़बान का ज़्यादा सिंगार करता था
पलट के आती नहीं है कभी नदी, यारो
मैं जानता था! मगर इंतज़ार करता था
--ज्ञान प्रकाश विवेक
मिला के हाथ वो पीछे से वार करता था
वो जब भी ठोकता था कील मेरे सीने में
बड़ी अदा से उसे आर-पार करता था
सितारे तोड़ के लाया नहीं कोई अब तक
कि इस फ़रेब पे वो ऐतबार करता था
उसे पता था कि जीवन सफ़ेद चादर है
ना जाने क्यूं वो उसे दागदार करता था
कुछ इस लिये भी मुझे उसकी बात चुभती थी
कि वो ज़बान का ज़्यादा सिंगार करता था
पलट के आती नहीं है कभी नदी, यारो
मैं जानता था! मगर इंतज़ार करता था
--ज्ञान प्रकाश विवेक
Tuesday, June 2, 2009
वो शक्स हंसता रहा जितनी देर मुझ से मिला
वो शक्स हंसता रहा जितनी देर मुझ से मिला
बस एक अश्क ने, सारी कहानियां रख दी
--ज्ञान प्रकाश विवेक
बस एक अश्क ने, सारी कहानियां रख दी
--ज्ञान प्रकाश विवेक
Wednesday, April 22, 2009
कमरे को नयी आब-ओ-हवा क्यों नहीं देते
कमरे को नयी आब-ओ-हवा क्यों नहीं देते
इन बूढ़े कलंडरों को हटा क्यों नहीं देते
इक शक्स गुलेलों को यहाँ बेच रहा है
ये राज़ परिंदों को बता क्यों नहीं देते
अलमारी में रख आओ गये वक़्त की एलबम
जो बीत गया उसको भुला क्यों नहीं देते
ए तेज़ हवा ! तू भला समझेगी कहाँ तक
हम तुझको चरागों का पता क्यों नहीं देते
पोशाक मेरी आपसे शफाक है ज़्यादा
ये मेरी खता है तो सज़ा क्यों नहीं देते
हम खानाबदोशों के नहीं होते ठिकाने
मत पूछ कि हम घर का पता क्यों नहीं देते
--ज्ञान प्रकाश विवेक
इन बूढ़े कलंडरों को हटा क्यों नहीं देते
इक शक्स गुलेलों को यहाँ बेच रहा है
ये राज़ परिंदों को बता क्यों नहीं देते
अलमारी में रख आओ गये वक़्त की एलबम
जो बीत गया उसको भुला क्यों नहीं देते
ए तेज़ हवा ! तू भला समझेगी कहाँ तक
हम तुझको चरागों का पता क्यों नहीं देते
पोशाक मेरी आपसे शफाक है ज़्यादा
ये मेरी खता है तो सज़ा क्यों नहीं देते
हम खानाबदोशों के नहीं होते ठिकाने
मत पूछ कि हम घर का पता क्यों नहीं देते
--ज्ञान प्रकाश विवेक
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