वही कारवाँ, वही रास्ते, वही जिंदगी वही मरहले
मगर अपने अपने मकाम पर, कभी तुम नहीं कभी हम नहीं
--Shakeel Badayuni
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Wednesday, September 28, 2011
वही कारवाँ, वही रास्ते, वही जिंदगी वही मरहले
Wednesday, October 21, 2009
तेरी महफ़िल से उठकर इश्क़ के मारों पे क्या गुज़री
तेरी महफ़िल से उठकर इश्क़ के मारों पे क्या गुज़री
मुख़ालिफ़ इक जहाँ था जाने बेचारों पे क्या गुज़री
सहर को रुख़्सत-ए-बीमार-ए-फ़ुर्क़त देखने वालो
किसी ने ये भी देखा रात भर तारों पे क्या गुज़री
सुना है ज़िन्दगी वीरानियों ने लूट् ली मिलकर्
न जाने ज़िन्दगी के नाज़बरदारों पे क्या गुज़री
हँसी आई तो है बेकैफ़ सी लेकिन ख़ुदा जाने
मुझे मसरूर पाकर मेरे ग़मख़्वारों पे क्या गुज़री
असीर-ए-ग़म तो जाँ देकर रिहाई पा गया लेकिन
किसी को क्या ख़बर ज़िन्दाँ की दिवारों पे क्या गुज़री
--शकील बँदायूनी
मुख़ालिफ़ इक जहाँ था जाने बेचारों पे क्या गुज़री
सहर को रुख़्सत-ए-बीमार-ए-फ़ुर्क़त देखने वालो
किसी ने ये भी देखा रात भर तारों पे क्या गुज़री
सुना है ज़िन्दगी वीरानियों ने लूट् ली मिलकर्
न जाने ज़िन्दगी के नाज़बरदारों पे क्या गुज़री
हँसी आई तो है बेकैफ़ सी लेकिन ख़ुदा जाने
मुझे मसरूर पाकर मेरे ग़मख़्वारों पे क्या गुज़री
असीर-ए-ग़म तो जाँ देकर रिहाई पा गया लेकिन
किसी को क्या ख़बर ज़िन्दाँ की दिवारों पे क्या गुज़री
--शकील बँदायूनी
Sunday, August 16, 2009
कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है
कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है
--शकील बदायूनी
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है
--शकील बदायूनी
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