मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं
हाये मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं
हम अभी तक हैं गिरफ़्तार-ए-मुहब्बत यारो
ठोकरें खा के सुना था कि सम्भल जाते हैं
ये कभी अपनी जफ़ा पर न हुआ शर्मिन्दा
हम समझते रहे पत्थर भी पिघल जाते हैं
उम्र भर जिनकी वफ़ाओं पे भरोसा कीजे
वक़्त पड़ने पे वही लोग बदल जाते हैं
--बशीर बद्र
Source : http://www.urdupoetry.com/bashir05.html
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Saturday, July 25, 2009
Sunday, April 5, 2009
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये
--बशीर बद्र
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये
--बशीर बद्र
ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से भी कम दी है ज़मीन
ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से भी कम दी है ज़मीन
पांव फैलाऊँ तो दीवार से सर लगता है
--बशीर बद्र
पांव फैलाऊँ तो दीवार से सर लगता है
--बशीर बद्र
सब चाहतें हैं मुझे, पर मेरा कोई नहीं
सब चाहतें हैं मुझे, पर मेरा कोई नहीं
मैं इस शहर में उर्दू की तरह हूँ
--बशीर बद्र
मैं इस शहर में उर्दू की तरह हूँ
--बशीर बद्र
Saturday, April 4, 2009
पत्थर के जिगर वालो, ग़म में वो रवानी है
पत्थर के जिगर वालो, ग़म में वो रवानी है
खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है
--बशीर बद्र
खुद राह बना लेगा, बहता हुआ पानी है
--बशीर बद्र
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