ज़िंदगी जिस को तेरा प्यार मिला वो जाने...
हम तो नाकाम रहे चाहने वालों की तरह
--जान निसार अख्तर
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Saturday, October 22, 2011
हम तो नाकाम रहे चाहने वालों की तरह
Sunday, August 21, 2011
तुम आये तो इस रात की औकात बनेगी
सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आये तो इस रात की औकात बनेगी
उनसे यही कह आये कि हम अब न मिलेंगे
आखिर कोई तरकीब-ए-मुलाक़ात बनेगी
ये हम से न होगा के किसी एक को चाहें
ए-इश्क ! हमारी न तेरे साथ बनेगी
हैरत कदा-ए-हुस्न कहाँ है अभी दुनिया
कुछ और निखार ले तो तिलिस्मात बनेगी
ये क्या के बढते चलो, बढते चलो आगे
जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी
--जान निसार अख्तर
Saturday, August 20, 2011
कल यही ख्वाब हकीकत में बदल जायेंगे
कल यही ख्वाब हकीकत में बदल जायेंगे
आज तो ख़्वाब फक़त ख़्वाब नज़र आते हैं
--जान निसार अख्तर
Tuesday, August 11, 2009
मैं जब भी उसके खयालों में खो सा जाता हूँ
मैं जब भी उसके खयालों में खो सा जाता हूँ
वो खुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे
--जान निसार अख्तर
वो खुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे
--जान निसार अख्तर
Sunday, August 2, 2009
अशार मेरे यूँ तो ज़माने के लिये हैं
अशार मेरे यूँ तो ज़माने के लिये हैं
कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिये हैं
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं
आँखों में जो भर लोगे तो कांटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिये हैं
देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिये हैं
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिये हैं
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिये हैं
--जान निसार अख्तर
Source : Click here
Audio : Click here
कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिये हैं
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं
आँखों में जो भर लोगे तो कांटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिये हैं
देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिये हैं
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिये हैं
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिये हैं
--जान निसार अख्तर
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Sunday, March 29, 2009
आँखों में जो भर लोगे तो कांटों से चुभेंगें
आँखों में जो भर लोगे तो कांटों से चुभेंगें
ये ख्वाब तो हैं पल्कों पे सजाने के लिये
--जान निसार अख्तर
Source : http://www.urdupoetry.com/jna03.html
ये ख्वाब तो हैं पल्कों पे सजाने के लिये
--जान निसार अख्तर
Source : http://www.urdupoetry.com/jna03.html
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