हम समझते थे के अब यादो की किश्ते चुक चुकीं
रात तेरी याद ने फिर से तकाजा कर दिया
--तुफैल चतुर्वेदी
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Sunday, July 24, 2011
हम समझते थे के अब यादो की किश्ते चुक चुकीं
Sunday, July 17, 2011
एक सस्ती शय का ऊंचे भाव सौदा कर लिया
उसके वादे के एवज में दे डाली जिंदगी
एक सस्ती शय का ऊंचे भाव सौदा कर लिया
--तौफेल चतुर्वेदी
Thursday, October 21, 2010
क्या करते
किसी को अपना करीबी शुमार क्या करते
वो झूठ बोलते थे, ऐतबार क्या करते
पलट के लौटने में पीठ पर लगा चाकू
वो गिर गया था, तो फिर उस पे वार क्या करते
गुजारनी ही पड़ी सांसें पतझड़ों के बीच
जो तू ही नहीं था, तो जान-ए-बहार क्या करते
दिए जलाना मोहब्बत के, अपना मज़हब है
हम जैसे लोग अँधेरे शुमार क्या करते
ख़याल ही नहीं आया, है ज़ख्म ज़ख्म बदन
जो चाहते थे तुझे, खुद से प्यार क्या करते
मिजाज़ अपना है, तूफ़ान को जीतना लड़ कर
उतर गया था, वो दरिया तो क्या करते
कुछ एक दिन में गज़ल से लड़ा ली आँखें
तमाम उम्र तेरा इंतज़ार क्या करते
--तुफैल चतुर्वेदी