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Sunday, June 27, 2010

वो तीर छोड़ा हुआ उसी कमान का था

वो तीर छोड़ा हुआ उसी कमान का था
अगरचे हाथ किसी और मेहरबान का था

गुज़र रहा था वो लम्हा जो दरमियान का था
मगर ये वक़्त बड़े सख्त इम्तेहान का था

पता नहीं की जुदा हो के कैसे जिंदा रहे
हमारा उसका ताल्लुक तो जिस्म-ओ-जान का था

हवा तो चलती ही रहती थी इस समंदर में
कसूर कोई अगर था तो बादवान का था

वही कहानी कभी झूठ थी, कभी सच्ची थी
ज़रा सा फर्क अगर था, तो बस बयान का था

क़दम क़दम पे नये मंज़रों की हैरत थी
तेरी गली का सफर था, कि इक जहान का था

हम अपने नाम के हिस्से को ढूँढ़ते भी कहाँ
ज़मीन के पास तो जो कुछ था, आसमान का था

कहीं ज़मीन पे सानी नहीं मिला उसका
वो शक्स जैसे किसी और आसमान का था

--मंज़ूर हाशमी