Showing posts with label Shyam Sakha Shyam. Show all posts
Showing posts with label Shyam Sakha Shyam. Show all posts

Wednesday, May 4, 2011

है घाटे का सौदा मुहब्बत सदा।

मुहब्बत की वापिस निशानी करें।
शुरू फिर जो चाहें कहानी करें।।

है घाटे का सौदा मुहब्बत सदा।
हिसाब अब लिखें या जुबानी करें।।

चलो नागफनियाँ उखाड़ें सभी।
वहाँ फिर खड़ी रात-रानी करें।।

है रुत पर भला बस किसी का चला।
चलो बातें ही हम सुहानी करें।।

खरीदे बुढापे को कोई नहीं।
सभी तो पसन्द अब जवानी करें।।

बहुत जी लिये और मर भी लिये।
बता क्या तेरा जिन्दगानी करें।।

रवायत नहीं ‘श्याम’ जब ये भली।
तो फिर बातें क्यों हम पुरानी करें।

--श्याम सखा

Source : http://gazalkbahane.blogspot.com/2011/05/gazal-shyam-skha-shyam.html

Wednesday, January 13, 2010

यूं भला कब तक मेरा इम्तिहान लोगे तुम

यूं भला कब तक मेरा इम्तिहान लोगे तुम
इस तरह तो एक दिन मेरी जान लोगे तुम

है खड़ी इक फ़स्ल गम की दिल में मेरे
दर्द की इस फ़स्ल का भी लगान लोगे तुम

एक पैसा दे के मैने दुआ थी चाही जब
कह उठा तब था फकीर आसमान लोगे तुम ?

--श्याम सखा 'श्याम'


Source : http://gazalkbahane.blogspot.com/2010/01/blog-post_13.html

Saturday, November 7, 2009

दीवाने की कब्र खुदी तो

लोग उसे समझाने निकले
पत्थर से टकराने निकले

बात हुई थी दिल से दिल की
गलियों में अफ़साने निेकले

याद तुम्हारी आई जब तो
कितने छुपे खज़ाने निकले

पलकों की महफि़ल में सजकर
कितने ख्वाब सुहाने नि्कले

आग लगी देखी पानी में
शोले उसे बुझाने निकले

दीवाने की कब्र खुदी तो
कुछ टूटे पैमाने निकले

सूने-सूने उन महलों से
भरे-भरे तहखाने निकले

'श्या्म’ उमंगें लेकर दिल में
महफि़ल नई सजाने निकले

--श्याम सखा श्याम


Source : http://gazalkbahane.blogspot.com/2009/11/blog-post.html

Wednesday, September 23, 2009

खेल मुहब्बत का है जारी

कैसे बीती रात न पूछो
बिगड़े क्यों हालात न पूछो

दिल की दिल में ही रहने दो
दिल से दिल की बात न पूछो

ज्ञान ध्यान की सुन लो बातें
जोगी की तुम जात न पूछो

देखा तुमको दिल बौराया
भड़के क्यों जज़बात न पूछो

खेल मुहब्बत का है जारी
किस की होगी मात, न पूछो

प्रेम-नगर में 'श्याम सखा’ जी
क्या पायी सौगात, न पूछो

--श्याम सखा


Source : http://gazalkbahane.blogspot.com/2009/09/blog-post.html

Saturday, August 22, 2009

उठ रहा कैसा दिल से धुआं देखिये

उठ रहा कैसा दिल से धुआं देखिये
हो गया इश्क शायद जवां देखिये

आप ही आप बस आ रहे हैं नजर
शौक से अब तो चाहे जहां देखिये

बात अपनी भले ही पुरानी सही
आप बस मेरा तर्जे-बयां देखिये

रहबरों रहजनों में हुई दोस्ती
अब जो लुटने लगे कारवां देखिये

आपकी तो ये ठहरी अदा ही मगर
लुट गया अपना तो कुल जहां देखिये

शोर कैसा खुदाया !ये बस्ती में है
उठ रहा है ये कैसा धुआं?देखिये

खत्म होने को ही है ये दौरे-खिजां
अब आप रौनके-गुलिस्तां देखिये

गर ये ऐसी ही रफ्तार कायम रही
कुछ दिनों बाद हिन्दोस्तां देखिये

दुल्हने सुब्‌ह अब सो के उठने को है
अब जरा सूरते आसमां देखिये

जाने वाला तो कब का चला भी गया
पांव के सिर्फ बाकी निशां देखिये

गोपियां मुझसे गोकुल की हैं पूछतीं
श्याम’को अपने ढूंढे कहां देखिये

--श्याम सखा श्याम


Source : http://kavita.hindyugm.com/2009/08/blog-post_20.html