बेकरारी गयी, करार गया
तर्क-ए-इश्क और मुझको मार गया
वो जो आये तो खुश्क हो गए अश्क
आज गम का भी ऐतबार गया
हम न हंस ही सके, न ही रो सके
वो गए या हर इख्तियार गया
आप की जिद-ए-बे-महल से कलीम
सब की नज़रों का ऐतबार गया
आ गए वो तो अब ये रोना है
लुत्फ़-ए-गम, लुत्फ़-ए-इंतज़ार गया
किस मज़े से तेरे बगैर "खुमर"
बे जिए ज़िंदगी गुज़ार गया
--खुमार बरबनकवी
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Saturday, November 19, 2011
बेकरारी गयी, करार गया
Sunday, March 14, 2010
वो सवा याद आये भुलाने के बाद
वो सवा याद आये भुलाने के बाद
जिंदगी बढ़ गयी ज़हर खाने के बाद
--खुमर बरबनकवी
[सवा = ज्यादा]
Tuesday, April 28, 2009
भूले हैं उन्हें राफ्ता राफ्ता मुद्दतों में हम
भूले हैं उन्हें राफ्ता राफ्ता मुद्दतों में हम
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये
--खुमर बरबनकवी
Source : http://www.urdupoetry.com/khumar04.html
किश्तों में खुदकुशी का मज़ा हम से पूछिये
--खुमर बरबनकवी
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Wednesday, April 1, 2009
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