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Monday, November 24, 2014

पहले हम दोनों वक़्त चुराकर लाते थे

पहले हम दोनों वक़्त चुराकर लाते थे

अब तब मिलते हैं जब भी फुरसत होती है

--जावेद अख्तर

Wednesday, October 1, 2014

जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,

जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की, 
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना  है ,

           पर  जहाँ से अपना दोस्त ना दिखे
               वो ऊंचाई  किस  काम  की!!

--जावेद अख्तर

Sunday, July 20, 2014

यही हालात इब्तदा से रहे

यही हालात इब्तदा से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे

बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे

इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे

बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे

उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे

--जावेद अख्तर

Thursday, January 16, 2014

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं

वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं
कौन दुःख झेले आजमाए कौन

आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आये कौन

जावेद अख्तर

Tuesday, January 14, 2014

मैं जानता हूँ कि ख़ामोशी में ही मस्लहत है

मैं जानता हूँ कि ख़ामोशी में ही मस्लहत है
मगर यही मस्लहत मेरे दिल को खल रही है

जावेद अख्तर
[मस्लहत=समझदारी]

Thursday, June 14, 2012

हो तालुक तो रूह से हो

हो ताल्लुक तो रूह से हो,
दिल तो अक्सर भर भी सकता है

--जावेद अख्तर

Sunday, October 30, 2011

दो चार नहीं मुझको फक़त एक ही दिखा दो

दो चार नहीं मुझको फक़त एक ही दिखा दो
वो शक्स जो अंदर से भी बाहर की तरह हो

--जावेद अख्तर

Friday, September 16, 2011

मरहम न सही एक ज़ख्म ही दे दो

मरहम न सही एक ज़ख्म ही दे दो
महसूस तो हो के कोई हमें भूल नहीं

--जावेद अख्तर

Sunday, September 4, 2011

काफिले रेत हुए दश्त-ए-जुनूं में कितने

काफिले रेत हुए दश्त-ए-जुनूं में कितने
फिर भी आवारा मिजाजों का सफर जारी है

--जावेद अख्तर

हम बुलाएं तो उन्हें काम निकल आते हैं

बेसबब यूं ही सर-ए-शाम निकल आते हैं
हम बुलाएं तो उन्हें काम निकल आते हैं
क्या बताऊँ इन हुस्न वालों की ए जावेद
हम बुलाएं तो परदा, वरना सर-ए-आम निकल आते हैं

--जावेद अख्तर

Thursday, August 25, 2011

एक ये ख्वाहिश के कोई ज़ख्म न देखे दिल का

एक ये ख्वाहिश के कोई ज़ख्म न देखे दिल का
एक ये हसरत कि कोई देखने वाला होता

--जावेद अख्तर

Source : https://www.facebook.com/JavedAkhtarJadoo?sk=wall

Monday, July 18, 2011

दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है

जब जब दर्द का बादल छाया
जब गम का साया लहराया
जब आँसू पलकों तक आया
जब यह तन्हा दिल घबराया
हमने दिल को ये समझाया
दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है
दुनिया में यूँही होता है

यह जो गहरे सन्नाटे हैं
वक़्त ने सबको ही बाँटे हैं
थोड़ा गम है सबका क़िस्सा
थोड़ी धूप है सबका हिस्सा
आँख तेरी बेकार ही नम है
हर पल एक नया मौसम है
क्यूँ तू ऐसे पल खोता है
दिल आख़िर तू क्यूँ रोता है

--जावेद अख्तर

From Movie ZINDAGI NA MILEGI DOBARA

Saturday, February 19, 2011

फिर मैं सुनने लगा हूँ इस दिल की

प्यास की कैसे लाये ताब कोई
न हो दरिया तो हो शराब कोई

रात बजती थी दूर शेहनाई
रोया पी के बहुत शराब कोई

कौन सा ज़ख्म किसने बक्शा है
इसका रखे कहाँ तक हिसाब कोई

फिर मैं सुनने लगा हूँ इस दिल की
आने वाला है फिर अज़ाब कोई

--जावेद अख्तर

Sunday, November 29, 2009

दर्द के फूल खिलते हैं, बिखर जाते हैं

दर्द के फूल खिलते हैं, बिखर जाते हैं
ज़ख्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं

--जावेद अख्तर

Monday, April 20, 2009

किन लव्ज़ों में इतनी कड़वी, इतनी कसीली बात लिखूं

किन लव्ज़ों में इतनी कड़वी, इतनी कसैली बात लिखूं
शेर की मैं तहज़ीब निभाऊँ या अपने हालात लिखूं
--जावेद अख्तर