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Monday, August 15, 2016

दे दिया क्या क्या मुझे

चाँद चेहरा जुल्फ दरिया , बात खुशबू, दिल चमन
एक तुझे देकर खुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे

#बशीर_बद्र

Sunday, October 28, 2012

ख़ुश्बू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में

ख़ुश्बू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में
माँगा था जिसे हमने दिन रात दुआओं में

तुम छत पर नहीं आये मैं घर से नहीं निकला
ये चाँद बहुत लटका सावन कि घटाओं में

इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी
फूलों की बदन वाली ख़ुश्बू सी अदाओं में

दुनिया की तरह वो भी हँसते हैं मुहब्बत पर
डूबे हुये रहते थे जो लोग वफ़ाओं में

--बशीर बद्र

Monday, January 9, 2012

ज़िंदगी से बारहा यूं भी निभाना पड़ गया

ज़िंदगी से बारहा यूं भी निभाना पड़ गया
खुल के रोना चाहा था, मुस्कुराना पड़ गया

उनकी आँखें भी नयीं हैं, उनके सपने भी नए
अपने बच्चों के लिए मैं ही पुराना पड़ गया

--बशीर बद्र

Sunday, January 8, 2012

उदास होने का कोई सबब नहीं होता

अदब की हद में हूँ बे-अदब नहीं होता
तुम्हारा ताज़किरह अब रोज-ओ-शब नहीं होता

कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूंही आँखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता

कई अमीरों की महरूमियाँ न पूछ के बस
गरीब होने का एहसास अब नहीं होता

मैं वालिदां को ये बात कैसे समझाऊं
मोहब्बत में हस्ब नसब नहीं होता

वहाँ के लोग बड़े दिल फरेब होते हैं
मेरा बहकना भी कोई अजब नहीं होता

मैं उस ज़मीन का दीदार करना चाहता हूँ
जहाँ कभी भी खुदा गज़ब नहीं होता

--बशीर बद्र

Thursday, January 5, 2012

मगर उम्र भर हाथ मलते रहे

मुसाफिर के रास्ते बदलते रहे
मुक़द्दर में चलना था चलते रहे

कोई फूल सा हाथ काँधे पे था
मेरे हाथ शोलों पे चलते रहे

मेरे रास्ते में उजाला रहा
दिए उसकी आँखों में जलते रहे

मोहब्बत, अदावत, वफ़ा बेरुखी
किराए के घर थे बदलते रहे

सुना है उन्हें भी हवा लग गयी
हवाओं का रुख जो बदलते रहे

वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे

--बशीर बद्र

Saturday, November 19, 2011

हम समझते रहे पत्थर भी पिघल जाते हैं

मिल भी जाते हैं तो कतरा के निकल जाते हैं
हाय !! मौसम की तरह दोस्त बदल जाते हैं

हम अभी तो हैं गिरफ्तार-ए-मोहब्बत यारो
ठोकरें खा के सुना था कि संभल जाते हैं

ये कभी अपनी जफा पर न हुआ शर्मिन्दा
हम समझते रहे पत्थर भी पिघल जाते हैं

उम्र भर जिनकी वफाओं पे भरोसा कीजे
वक़्त पड़ने पे वही लोग बदल जाते हैं

--बशीर बद्र

Monday, November 7, 2011

फूल सा कुछ कलाम और सही

फूल सा कुछ कलाम और सही
एक गज़ल उसके नाम और सही

उसकी जुल्फें बहुत घनेरी हैं
एक शब का कयाम और सही
(कयाम=stay)

ज़िंदगी के उदास किस्से हैं
एक लड़की का नाम और सही

करसियों को सुनाइये गज़लें
क़त्ल की एक शाम और सही

कपकपाती है रात सीने में
ज़हर का एक जाम और सही

--बशीर बद्र

http://aligarians.com/2007/05/phuul-saa-kuch-kalaam-aur-sahii/

Sunday, September 4, 2011

तुम हो मेरी जिंदगी ये सच है

तुम हो मेरी जिंदगी ये सच है
जिंदगी का मगर भरोसा क्या

--बशीर बद्र

Wednesday, June 30, 2010

न जी भर के देखा, न कुछ बात की

न जी भर के देखा, न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

--बशीर बद्र

Tuesday, February 9, 2010

भले हम मिले भी तो क्या मिले, वही दूरियाँ वही फासले

भले हम मिले भी तो क्या मिले, वही दूरियाँ वही फासले,
न कभी हमारे क़दम बढे न कभी तुम्हारी झिझक गई

--बशीर बद्र

Tuesday, January 5, 2010

मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं

सोचा नहीं अच्छा बुरा देखाअ सुना कुछ भी नहीं
मांगा खुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं

देखा तुझे सोचा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे
मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं

इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत मूँह से कहा कुछ भी नहीं

दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं

अहसास की ख़ुश्बू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ
ख़ामोश यादों के सिवा, घर में रहा कुछ भी नहीं

--बशीर बद्र


Source : http://www.urdupoetry.com/bashir03.html

Thursday, November 19, 2009

देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे

देखा तुझे, सोचा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे
मेरी ख़ता मेरी वफा, तेरी खता कुछ भी नहीं

--बशीर बद्र


Source : http://www.urdupoetry.com/singers/JC059.html

Complete gazal : http://yogi-collection.blogspot.com/2010/01/blog-post_9512.html

Tuesday, September 8, 2009

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में
--बशीर बद्र