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Friday, January 18, 2013

रस्म-ए-उल्फत सिखा गया कोई

रस्म-ए-उल्फत सिखा गया कोई
दिल की दुनिया पे छा गया कोई

ता-क़यामत किसी तरह न बुझे
आग ऐसी लगा गया कोई

दिल की दुनिया उजरी सी क्यों है
क्या यहाँ से चला गया कोई

वक्त-ए-रुखसत गले लगा कर "दाग"
हँसते हँसते रुला गया कोई

--दाग देहलवी

Sunday, October 9, 2011

थोड़ा सा दर्द दिल में खटकने को रह गया

गम ने तेरे निचोड़ लिया कतरा कतरा खून
थोड़ा सा दर्द दिल में खटकने को रह गया

--दाग देहेलवी

Wednesday, June 1, 2011

जी जानता है

लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है
रंज भी इतने उठाए हैं कि जी जानता है

जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने
तूने दिल इतने दुखाए हैं कि जी जानता है

--दाग देहलवी

Tuesday, December 7, 2010

हर एक से कहते हैं क्या "दाग" बेवफ़ा निकला

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
ना था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे निभायेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा ना दिल में वो बे-दर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

ना पूछ-पाछ थी किसी की ना आव-भगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्ज़े किये पढ़ा भी नहीं
सुन जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इंहीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

हर एक से कहते हैं क्या "दाग" बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किस का था

--दाग देहलवी

Source : http://www.urdupoetry.com/daag01.html

अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का

अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाय! ज़माना दिल का

तुम भी मुँह चूम लो बेसाख़ता प्यार आ जाए
मैं सुनाऊँ जो कभी दिल से फ़साना दिल का

पूरी मेंहदी भी लगानी नहीं आती अब तक
क्योंकर आया तुझे, ग़ैरों से लगाना दिल का

इन हसीनों का लड़कपन ही रहे, या अल्लाह
होश आता है, तो आता है सताना दिल का

निगाह-ए-यार ने की ख़ाना ख़राबी ऐसी
न ठिकाना है जिगर का, न ठिकाना दिल का

--दाग़ देहलवी

Similar post by Parveen Shakir : http://yogi-collection.blogspot.in/2013/01/blog-post_7.html

Thursday, March 4, 2010

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा

ले चला जान मेरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था ना आना तेरा

अपने दिल को भी बताऊँ ना ठिकाना तेरा
सब ने जाना जो पता एक ने जाना तेरा

तू जो ऐ ज़ुल्फ़ परेशान रहा करती है
किस के उजड़े हुए दिल में है ठिकाना तेरा

ये समझ कर तुझे ऐ मौत लगा रखा है
काम आता है बुरे वक़्त में आना तेरा

अपनी आँखों में भी कौँध गई बिजली सी
हम ना समझे कि ये आना है कि जाना तेरा

दाग को यूँ वो मिटाते हैं ये फ़र्माते हैं
तू बदल डाल हुआ नाम पुराना तेरा

--दाग देहलवी

[बिजली कौंधना = strike/flash of lightning]

Source : http://www.urdupoetry.com/daag29.html

Wednesday, February 17, 2010

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूठी क़सम से आप का इमान तो गया

दिल लेके मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उलटी शिकयतें रही एहसान तो गया

अब शाय-ए-राज़-ए-इश्क़ गो ज़िल्लतें हुई
लेकिन उसे जता तो दिया, जान तो गया

[शाय-ए-राज़-ए-इश्क़=secret of love being known; ज़िल्लत=humiliation]

देखा है बुतकदे में जो ऐ शेख़ कुछ ना कुछ
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया

डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं
सुन-सान घर ये क्यूँ ना हो, मेहमान तो गया

गो नामाबर से ख़ुश ना हुआ पर हज़ार शुक्र
मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया

होश-ओ-हवास-ओ-ताब-ओ-तवाँ "दाग" जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

[होश-ओ-हवास-ओ-ताब-ओ-तवाँ=sense, sensibility, strength, health]

--दाग देहलवी

Friday, December 18, 2009

दिल दे तो इस मिजाज़ का परवरदिगार दे

दिल दे तो इस मिजाज़ का परवरदिगार दे
जो रंज की घड़ी को खुशी में गुज़ार दे
--दाग देहलवी

Saturday, December 5, 2009

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता

ना मज़ा है दुश्मनी में ना है लुत्फ़ दोस्ती में
कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता

ये मज़ा था दिल्लगी का के बराबर आग लगती
ना तुम्हें क़रार होता ना हमें क़रार होता

तेरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते
अगर अपनी ज़िन्दगी का हमें ऐतबार होता

--दाग़ देहलवी


Source http://www.urdupoetry.com/daag04.html