Tuesday, August 24, 2010

कुछ मेरी ही मिट्टी में बगावत भी बहुत थी

रास्ता भी कठिन था धूप में शिद्दत भी बहुत थी
साए से मगर उसको मोहब्बत भी बहुत थी
कुछ तेरे ही मौसम जो मुझे रास न आये
कुछ मेरी ही मिट्टी में बगावत भी बहुत थी
--अज्ञात 

3 comments:

  1. वाह्…………………गज़ब का भाव्।

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  2. I don't know the source, but i remember few more lines of this:

    is tarq-e-rifaqat se pareshaan to hu lekin,
    ab tak k tere sath pe hairat bhi bahut thi,
    khush aaye tujhe shahar-e-munafiq ki ameeri,
    hum logo ko sach kehne ki aadat bhi bahut thi

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  3. Thanks Ankita, for sharing...

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