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Thursday, October 24, 2019
Saturday, October 5, 2019
Tuesday, September 17, 2019
रोज़ रोज़ जलते हैं, फिर भी ख़ाक ना हुए
रोज़ रोज़ जलते हैं, फिर भी खाक़ न हुए,
अजीब हैं कुछ ख़्वाब भी मेरे, बुझ कर भी राख़ न हुए
--अज्ञात
Saturday, July 27, 2019
मैं प्यार के सरोवर में आग लिख रहा हूँ।
प्राणों में ताप भर दे वो राग लिख रहा हूँ
मैं प्यार के सरोवर में आग लिख रहा हूँ।
मेरी जो बेबसी है, उस बेबसी को समझो
उजडे़ हुए चमन को मैं बाग लिख रहा हूँ।
दामन पे मेरे जाने कितने लहू के छींटे
धोया न जा सके जो वो दाग लिख रहा हूँ।
दुनिया है मेरी कितनी ये तो नहीं पता, पर
धरती है मेरी जितनी वो भाग लिख रहा हूँ।
कितने अमीर होंगे दस बीस फ़ीसदी बस
कमज़ोर आदमी का मैं त्याग लिख रहा हूँ।
सब लोग मैल अपनी मल-मल के धो रहे हैं
असहाय साबुनों का मैं झाग लिख रहा हूँ
- डी. एम. मिश्र
🙏🌹🙏......
Monday, June 24, 2019
रात गुज़री हमारी सितारों के साथ
गुमनाम, अनजाने तारों के साथ
रात गुज़री हमारी सितारों के साथ
याद है, तन्हाई है, ग़म है, शब् है
अच्छी कट रही है चारों के साथ
माना होते हैं कान पर ज़ुबां तो नहीं
कबतलक करें बात दीवारों के साथ
फिक जाते हैं बनके रद्दी दिन ढलते ही
हादसा ये रोज़ होता है अख़बारों के साथ
देख तन्हा चले आते हैं मिलने हमसे
दोस्ती सी हो गई है अशआरों के साथ
खेलने बाज़ी इश्क़ की हाथ में दिल लिए
तैयार शादीशुदा भी यहाँ कुंवारों के साथ
मझधार में ही मिलेगी मंज़िलें हमारी
कर लिया हैं किनारा, किनारों के साथ
लहरें ही करेंगीं पार नैया कश्ती की
रिश्ता तोड़ दिया है पतवारों के साथ
क्या सही है और क्या ग़लत ‘अमित’
एक द्वन्द्व सी छिड़ी है विचारों के साथ
--अमित हर्ष
Friday, June 21, 2019
ये बात उस तरह भी नहीं थी
गुंजाइश, कोई जगह भी नहीं थी
बिछड़ने की .. वजह भी नहीं थी
जाने कब कैसे गाँठ पड़ गई
कहीं कोई गिरह भी नहीं थी
जिस तरह समझी है तुमने
ये बात उस तरह भी नहीं थी
वही दलील दिल, दर्द .. दूरी की
और तो कोई जिरह भी नहीं थी
शिक़स्त ही वाबस्ता थी दोनों तरफ
मेरी हार उसकी फ़तह भी नहीं थी
डूबते गए सब शायरी में जिसमें
गहराई क्या सतह भी नहीं थी
चाँद-सितारों, नींद, ख्वाबों से सजा ली
जिस रात की कोई सुबह भी नहीं थी
पास-दूर, दोस्त-दुश्मन, अज़ीज़-गैर
वो हमारी किसी तरह भी नहीं थी
जायेगी देखना प्राण लेकर ही
वैसे पीड़ा इतनी असह भी नहीं थी
जो मायने निकाले गए मेरी शायरी के
उतनी समझ तो मुझे भी नहीं थी
बिखरे पड़े थे जहन में ‘अमित’ के
ख्यालों की कोई तह भी नहीं थी
--अमित हर्ष
Thursday, June 13, 2019
पर हमें प्यार अभी से ढेर सारा आ रहा है
ये दिल फिर तुम पर हमारा आ रहा है
एक मोदी ही नहीं जो दुबारा आ रहा है
आते आते आता है आदाब-ए-इश्क़ यूँ तो
पर हमें प्यार अभी से ढेर सारा आ रहा है
वो गली वो घर कब का छोड़ चुके हैं हम
जिस पते पर अब ख़त तुम्हारा आ रहा है
ख़ुद ब ख़ुद धुल गईं हैं आँखें अश्क से
अब साफ़ नज़र हर नज़ारा आ रहा है
अब चाँद से होंगे मुख़ातिब रात तमाम
सूरज तो सुबह का थका हारा आ रहा है
तुमने तो कहा था रखना अपना ‘अमित’
पर ख़्याल क्यूँ रह रहकर तुम्हारा आ रहा है
--अमित हर्ष
Sunday, April 28, 2019
जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों मे बंट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से मे कुछ बचा ही नहीं
जिन्दगी मौत तेरी मंज़िल है
और तो कोई रास्ता ही नहीं
जिसके कारण फसाद होते हैं
उसका कोई अता पता ही नहीं
ज़िन्दगी, अब बता कहाँ जाये
बाज़ार मे ज़हर मिला ही नहीं
सच घटे या बढ़े, तो सच ना रहे
झूठ की कोई इन्तिहां ही नहीं
धन के हाथों बिके हैं सब कानून
अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं
चाहे सोने के फ्रेम मे जड़ दो
आइना झूठ बोलता ही नहीं
-कृष्ण बिहारी नूर
Thursday, April 18, 2019
जिन्दगी सितम तेरे भी बेहिसाब रहे
ना कोई शिकवा, ना कोई गिला, ना कोई मलाल रहा;
ज़िन्दगी सितम तेरे भी बेहिसाब रहे, सब्र मेरा भी कमाल रहा!
Monday, April 8, 2019
Tuesday, March 26, 2019
और सुनाओ क्या हाल है
मालूम सबको है कि जिंदगी बेहाल है..
लोग फिर भी पूछते हैं...
"और सुनाओ क्या हाल है"..?
आप रहने दो !!!!!
दिल की ज़िद थी, कि शिकायत नहीं करनी "वर्ना" ,
तुम से तो वो गिले हैं कि बस..... आप रहने दो !!!!!
Monday, December 31, 2018
वो वादे भी करता है तो सरकार की तरह
ख़ुशनुमा, दिलकश, फ़स्ल-ए-बहार की तरह
रंग-ए-दुनिया भी बिलकुल इश्तिहार की तरह
महज़ एक नई तारीख़ बताने की ख़ातिर
सूरज निकलता है रोज़ बस अख़बार की तरह
वफ़ा की जगह अब नफ़ा तलाशते हैं
लोग इश्क़ भी करते हैं कारोबार की तरह
रस्मन, मजबूरन तो कभी ख़ुशी के साथ
हम मनाएंगे भी तुझे तो त्यौहार की तरह
टूट जाएँ पुराने तो नये हाज़िर हैं
वो वादे भी करता है तो सरकार की तरह
बाँधते हैं एहतियात से फिर क्यों रेज़ा रेज़ा
उम्मीदें भी बिखर जातीं हैं एतबार की तरह
कुछ नवाजेंगे मोहब्बत-ओ-दाद से खुलकर
कुछ नज़रअंदाज़ भी करेंगे हरबार की तरह
हक़ीक़त तो कभी कहीं कुछ फ़साने ‘अमित’
दर्ज करता रहता है यहाँ अशआर की तरह
अमित हर्ष
Friday, December 28, 2018
हर बात पे ऐ दोस्त ! ग़म नहीं करते
लज्ज़त-ए-ज़िन्दगी कम नहीं करते
हर बात पे ऐ दोस्त ! ग़म नहीं करते
दिक्कतें खटखटाती है दरवाजा रह रह के
पर उनसे मुलाक़ात अब हम नहीं करते
मायूस हो जायेंगी मंजिलें न पा कर तुझे
बढ़ाकर आगे यूं पीछे क़दम नहीं करते
नेमत है खुदा की और इबादत भी है ये
मेरी जान ! इश्क में शरम नहीं करते
न ज़िक्र तकलीफ का, न शिकवा कोई
सितम पे उनके यूं सितम नहीं करते
मसला ही हुआ हल, न खातमा किरदार का
बीच कहानी किस्सा यूं खतम नहीं करते
बेपनाह मोहब्बतों से नवाज़ा गैरों ने यूं तो
फ़क़त अहबाब ‘अमित’ पे करम नहीं करते
* * अहबाब ahbaab = मित्रगण, दोस्त friends (हबीब का बहुवचन)
-- अमित हर्ष
Friday, October 26, 2018
Friday, October 5, 2018
तजुर्बे के मुताबिक खुद को ढाल लेता हूं
*तजुर्बे के मुताबिक़, खुद को ढाल लेता हूं,,!*
*कोई प्यार जताए तो, जेब संभाल लेता हूं,,,!!*
*नहीं करता थप्पड़ के बाद, दूसरा गाल आगे,,!*
*खंजर खींचे कोई, तो तलवार निकाल लेता हूं,,,!!*
*वक़्त था सांप की, परछाई डरा देती थी,,!*
*अब एक आध मै, आस्तीन में पाल लेता हूं,,!!*
*मुझे फासने की, कहीं साजिश तो नहीं,,!*
*हर मुस्कान ठीक से, जांच पड़ताल लेता हूं,,,!!*
*बहुत जला चुका उंगलियां, मैं पराई आग में,,!*
*अब कोई झगड़े में बुलाए, तो मै टाल देता हूं,,,!!*
*सहेज के रखा था दिल, जब शीशे का था,,!*
*पत्थर का हो चुका अब, मजे से उछाल लेता हूं,,,,!!*
Tuesday, September 25, 2018
रात तेरे ख्वाब मददगार गुज़रे
भूलने लगे जो विसाल-ए-यार गुज़रे
लम्हात-ए-याद मगर यादग़ार गुज़रे
कट गई तमाम शब देखते देखते
रात तेरे ख्वाब .. मददगार गुज़रे
फ़क़त एक इश्क़ से घबरा गए आप
ये हादसे संग मेरे .. कई बार गुज़रे
मिलो तुम हरदम महंगाई की तरह
उम्मीद लिए हम सरे-बाज़ार गुज़रे
ज़रुरतमंद हूँ ये ख़बर क्या फ़ैली
बचकर सरेराह दोस्त-यार गुज़रे
मुफ़्त अच्छी है शायरी ‘अमित’ की
कहते हुए दर से मेरे खरीदार गुज़रे
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bhoolne lage jo visaal-e-yaar guzare
lamhaat-e-yaad magar yaadgaar guzare
kat gayi tamaam shab dekhte dekhte
raat tere khwaab .. madadgaar guzare
faqat ek ishq se ghabraa gaye aap
ye haadase sang mere .. kai baar guzre
milo tum hardam mehngaayi kii tarah
ummeed liye ham sare bazaar guzre
zarooratmand hoon ye khabar kya failii
bachkar sareraah dost-yaar guzare
muft achchhi hai shayari ‘amit’ kii
kahte huye sar se mere khreedaar guzre
लंबी कर दी
मुख़्तसर सी थी सो शुरुआत लम्बी कर दी
कुछ इस तरह से हमने बात लम्बी कर दी
सुबह तलक टूट जायेंगे मालूम था ख़्वाब
बस इस ख़ातिर खींचकर रात लम्बी कर दी
ऐ ज़िन्दगी तुझसे मिलकर अच्छा तो लगा
पर तूने बेवजह मुलाक़ात लम्बी कर दी
छाई कुछ यूँ कि घटती ही नहीं तनिक
घटा ने बढ़ाकर बरसात लम्बी कर दी
बात बात में ‘अमित’ ये छोटी सी ग़ज़ल
तुमने देखो बिना-बात लम्बी कर दी
Sunday, September 23, 2018
फ़िक्र-ए-दुनिया, ग़म-ए-रोज़गार, यादें तुम्हारी
बस मुलाक़ातें हक़ीक़त से टालते रहना
यूँ बुरा नहीं पास कुछ मुग़ालते रहना
मुमकिन है मिल जायें कुछ अनछुए भी
तुम ख़्यालों को यूँ ही खंगालते रहना
खींचेंगे पीछे, फिर काटेंगे पलटकर
अच्छा नहीं बीते पल, पालते रहना
आग पेट की या सीने की, बुझनी चहिए
मुनासिब नहीं लहू यूं उबालते रहना
मंज़िलें गुम गईं पर सफ़र तो संग है
चलने वास्ते रास्ते निकालते रहना
तैरते हैं हवा में उन सियासी के दरमियाँ
कुछ मुद्दे मुहब्बत के उछालते रहना
फ़िक्र-ए-दुनिया, ग़म-ए-रोज़गार, यादें तुम्हारी
बहुत मुश्किल संग सब संभालते रहना
अब हवाले तुम्हारे हर मिसरे हमारे
ये अमानत ‘अमित’ की देखते-भालते रहना
Amit Harsh