Sunday, October 4, 2009

अजनबी ख्वाहिशें हैं, मैं दबा भी न सकूँ

अजनबी ख्वाहिशें हैं, मैं दबा भी न सकूँ
ऐसे ज़िद्दी है परिन्दे कि उड़ा भी न सकूँ

फूंक डालूँगा किसी रोज़ ये दिल की दुनिया
ये तेरा खत तो नहीं, के जला भी न सकूँ

मेरी ग़ैरत भी कोई शै है, के महफिल में मुझे
उसने इस तरह बुलाया है के जा भी न सकूँ

एक न एक रोज़ तो मैं ढूँढ ही लूँग तुझको
ठोकरें ज़हर नहीं है, कि मैं खा भी न सकूँ

फल तो सब मेरे दरख्तों पर पके हैं लेकिन
इतनी कमज़ोर है शाखें के हिला भी न सकूँ

एक न एक रोज़ तो मैं ढूँढ ही लूँग तुझको
ठोकरें ज़हर नहीं है, कि मैं खा भी न सकूँ

--अज्ञात

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