Monday, July 12, 2010

चलो ये मान लिया के आँख मेरी नम

चलो ये मान लिया के आँख मेरी नम नहीं
गुमान न कर के मेरे दिल में कोई गम नहीं

उसी को खौफ है कि मंजिलें कठिन हैं बहुत
वफ़ा की राह पे मेरा जो हमकदम नहीं

तुम्हे गुरूर है अपनी सितामगिरी पे अगर
ए दोस्त हौंसला जीने का मुझ में भी कम नहीं

सुरूर-ए-दिल भी वही है अज़ीज़-ए-जान भी वही है
के डर-ए-जीस्त पे एक नाम जो रकम भी नहीं

इल्म जो हक का उठाया है मैंने अभी
बहाल सांस है, बाजू में कलम भी नहीं

हज़ार गम हैं मगर फिर जो सलामत हूँ
तो किस तरह से कह दूं तेरा करम भी नहीं

--अज्ञात

6 comments:

  1. शानदार पोस्ट

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  2. बहुत उम्दा गज़ल पढ़वाई..

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  3. शुक्रिया इस लाजवाब ग़ज़ल के लिए ......!!

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  4. ये शानदार ग़ज़ल चुराई हुई है और सही भी नही है इसमे गलतियां भी हैं

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    1. इस ब्लॉग पर पोस्ट कोई भी कविता या ग़ज़ल मेरी खुद की निर्मित नहीं है । इसी लिए अंत में अज्ञात लिखा है । अगर आपको इसके लेखक का नाम पता हो तो कृपया बताएं source के साथ ।

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  5. This comment has been removed by a blog administrator.

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