Monday, July 26, 2010

पलकों पे रुकी बूँद भी रोने को बहुत है

पलकों पे रुकी बूँद भी रोने को बहुत है
एक अश्क भी दामन के भिगोने को बहुत है

ये वाक्या है, दिल में मेरे तेरी मुहब्बत
होने को बहुत कम है, ना होने को बहुत है

फिर क्या उसी तारीख़ को दोहराओगे कातिल
नेज़े पे मेरा सर ही पिरोने को बहुत है
[नेज़ा = भाला]

हर शाख पे उतरेंगे समर दुश्मनियों के
नफरत का बस इक बीज ही बोने को बहुत है
[समर = Fruit]

किस तरह से बातिन पे चढ़ी मैल उतारें
जो ज़ख्म बदन पर है, वो धोने को बहुत हैं

--मोहसिन नकवी

Source : http://forum.urduworld.com/f152/palkon-pe-ruki-boond-286058/

1 comment:

  1. आभार गज़ल पढ़वाने का.

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