Saturday, December 5, 2009

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन

लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

कितना है बद_नसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी ना मिली कू-ए-यार में
कू-ए-यार=यार की गली

--बहादुर शाह ज़फर

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