उदास ज़िन्दगी, उदास वक्त, उदास मौसम...
कितनी चीज़ों पे इल्ज़ाम लग जाता है तेरे बात न करने से
--अज्ञात
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उदास ज़िन्दगी, उदास वक्त, उदास मौसम...
कितनी चीज़ों पे इल्ज़ाम लग जाता है तेरे बात न करने से
--अज्ञात
तेरे दोस्तों में तेरा भ्रम रहे,
यही सोच कर मैं चुप रहा
जो निगाह में था वो छुपा लिया
जो दिल में था वो कहा नहीं
--अज्ञात
नया एक रब्त क्यों करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यों करें हम
खामोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यों करें हम
ये काफी है के हम दुश्मन नहीं हैं
वफादारी का दावा क्यों करें हम
वफ़ा, इखलास, कुर्बानी, मोहब्बत
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यों करें हम
हमारी ही तमन्ना क्यों करो तुम
तुम्हारी ही तमन्ना क्यों करें हम
नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी
तो फिर दुनिया की परवाह क्यों करें हम
--अज्ञात
जो हो एक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता
हर एक कश्ती का अपना तजुर्बा होता है दुनिया में
सफर में रोज़ ही मझधार हो ऐसा नहीं होता
कहानी में तो किरदारों को जो चाहिए बना दीजिए
हकीक़त में कहानीकार हो ऐसा नहीं होता
कहीं तो कोई होगा जिसको अपनी भी ज़रूरत हो
हर एक बाज़ी में दिल की हार हो ऐसा नहीं होता
सिखा देती हैं चलना ठोकरें भी राहगीरों को
कोई रास्ता सदा दुश्वार हो ऐसा नहीं होता
--अज्ञात
अपनी तनहाई तेरे नाम पे आबाद करे
कौन होगा जो तुझे मेरी तरह याद करे
--अज्ञात
जो कभी अपना नहीँ था उसे खोकर रोया
उसकी खातिर मै गैर था जिसका होकर रोया
इस उदासी का सबब मै किसी से क्या कह दूँ
कभी दिल ही मे, कभी पलके भिगोकर रोया
प्रमोद तिवारी
गमों में डूबे तो फिर जगमगा के निकले हैं ...
यहाँ डूबे थे ... बड़ी दूर जा के निकले हैं ....
तेरी बाहों में बड़े प्यार से आये थे मगर ..
तेरे पंजो से बहुत छटपटा के निकले हैं ...
तूने भी दिल को दुखने की इन्तहा कर दी...
हम भी महफ़िल से मगर मुस्कुरा के निकले हैं ..
कई लोगो से मेरी नौकरी की बात हुई ...
बहुत से काम तो हाथो में आ के निकले हैं ...
मेरे ही ज़ब्त ने बेचैन किया है तुझको ..
ये तेरे आंसू मुझे आजमा के निकले हैं ...
बड़े तैराक हैं ये मैंने खुद भी देखा है ...
यहाँ कूदे थे .. बहुत दूर जा के निकले हैं ..
धड़कने रुक गयी , दम भी निकल गया मेरा..
सभी अरमान तेरे पास आ के निकले हैं ..
हमने हर नौकरी बर्बाद होके छोड़ी है ...
सबको लगता है के पैसा कमा के निकले हैं ..
ऐसे वैसो को भी दिल में बसा लिया ''सतलज'
बहुत से लोग तो बातें बना के निकले हैं ...
वो अजब शक्स था ऐ ज़िन्दगी...
जिसे समझ के भी न समझ सके...
मुझे चाहता भी गज़ब था...
मुझे छोड़ के भी चला गया...
--अज्ञात
नया दर्द एक दिल में जगा कर चला गया
कल फिर वो मेरे शहर में आ कर चला गया
जिसे ढूँढ़ते रहे हम लोगों की भीड़ में
मुझसे वो अपने आप को छुपा कर चला गया
मैं उसकी खामोशी का सबब पूछता रहा
वो किस्से इधर उधर के सुना कर चला गया
ये सोचता हूँ के मैं कैसे भुलाऊंगा अब उसे
उस शक्स को जो मुझको पल भर में भुला कर चला गया
बहुत बुरा है मगर फिर भी तुम से अच्छा है
ये दिल का दर्द जो हर पल साथ रहता है
--अज्ञात
मेरे दिल पे नक्श तेरी यादों का
ऐसे में कैसे किसी और को सोचूँ
--अज्ञात
पास ‘दोस्ती की दौलत’ हो तो डर नहीं लगता
ये वो कमाई है .... जिसपर ‘कर’ नहीं लगता
छुपाया था यूं तो बड़े जतन से .... ज़माने से
पर उस ‘राज़’ से कोई .. बेखबर नहीं लगता
ये कवायद .. ‘एहतियात-ओ-सब्र’ मांगती है
इश्क में कोई .. ‘जोर-ओ-ज़बर’ नहीं लगता
सारे पुर्जे जिस्म के ....... जवाब दे रहे है
कभी दिल .. तो कभी जिगर नहीं लगता
वो कहते है ‘अमित’ का कोई .. सानी नहीं है
ऐसा भी नहीं कोई उससे बेहतर नहीं लगता
समझौता उसने भी कर लिया हालात से शायद
अब 'अमित' में भी ...... वो ‘तेवर’ नहीं लगता
--अमित हर्ष
कैसे कोई छुपाये आंसू
आखिर आँख में आये आंसू
तुझको ये मालूम नहीं
कितने रात बहाए आंसू
दर्द की लज़्ज़त और बढ़ी
जब आंसू में मिलाए आंसू
--अज्ञात
नियम भी हैं, कायदे भी हैं
बने बनाये इश्क के वायदे भी हैं
नुकसान तुमने उठाये हैं, पर मानस
सुनो, इश्क के अपने फायदे भी हैं
मानस भारद्वाज
तलुवे तले जीभ उतारकर रख दी
बोतल शराब की निकालकर रख दी
मुहब्बत का पन्ना पन्ना याद किया
किताब आंसू से जलाकर रख दी
तुम्हे तो ये भी नहीं पता है , सोना
हमने ज़िन्दगी कहाँ गुजारकर रख दी
ज़हर अभी उतरा भी नहीं था
तेरी याद फिर सजाकर रख दी
तूने भी हिस्से में कुछ नहीं छोड़ा
हमने भी विरासत गँवाकर रख दी
मानस भारद्वाज