Sunday, December 12, 2010

कितनी उल्फत है हमें तुझसे

भूल जाना भी क्या ज़रूरी है
याद आना भी क्या ज़रूरी है ?

तू जो कहता है, सच ही कहता है
कसमें खाना भी क्या ज़रूरी है ?

रूठ जाना तुम्हारी आदत है
फिर बहाना बनाना भी क्या ज़रूरी है ?

तेरी महफ़िल में घायल बैठे हैं
मेरा आना भी क्या ज़रूरी है ?

सब ही कहते हैं इश्क है आतिश
आजमाना भी क्या ज़रूरी है ?

कितनी उल्फत है हमें तुझसे
ये बताना भी क्या ज़रूरी है ?

--अज्ञात

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