ठहरे हो क्यूं यहाँ पे, गुज़र क्यों नहीं जाते
इतनी बुरी है दुनिया, तो मर क्यों नहीं जाते
तुमको पता है, ज़ख्मों से, पैरों से, बारहा
खुद ठोकरों ने पूछा, सुधर क्यों नहीं जाते
[बारहा=बार बार]
किस की पनाह में तुझको गुज़ारे ऐ जिंदगी
रास्तों ने भी तो कह दिया, घर क्यों नहीं जाते
बर्बाद हो रही है निभाने में जिंदगी
जो कह दिया है उस से मुकर क्यों नहीं जाते
बिछड़ा अगर मैं तुमसे तो मर जाऊँगा जानम
तुमको डरा रहा हूँ मैं, डर क्यों नहीं जाते
परवरदिगार मेरे मुकद्दर में हिज्र क्यों
दिन सारे मोहब्बत में गुज़र क्यों नहीं जाते
मेरी वफ़ा की राह में चाहत में कई बार
मरने का कहते आये हो, मर क्यों नहीं जाते
कितनी हसीं जुल्फें हैं, चेहरा गुलाब है
क्या बात है ख्यालों इधर क्यों नहीं जाते
इस मोड से अब तेरे मेरे रास्ते अलग हैं
इस मोड पे कुछ देर ठहर क्यों नहीं जाते
सौ बार तमन्ना का मेरी खून किया है
तुम अब मेरी नज़रों से उतर क्यों नहीं जाते
दावे से इन्तेहा यही ज़ब्त करने की है
'सतलज' सहोगे कितना बिखर क्यों नहीं जाते
--सतलज राहत
Satlaj raahat on Facebook
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Tuesday, June 14, 2011
ठहरे हो क्यूं यहाँ पे, गुज़र क्यों नहीं जाते
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