हाँ किरदार कहानी के सच्चे नही है
पढ़ने वाले भी लेकिन बच्चे नही है
जिसके दामन पे लगे वही जानता है
दाग कैसे भी लगे, अच्छे नही है
--अमोल सरोज
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Tuesday, November 5, 2013
पढ़ने वाले भी लेकिन बच्चे नही है
Saturday, October 26, 2013
डरता हूँ कहने से के मोहब्बत है तुमसे
डरता हूँ कहने से के मोहब्बत है तुमसे
मेरी ज़िन्दगी बदल देगा, तेरा इकरार भी, इनकार भी
--अज्ञात
Sunday, October 13, 2013
झूठी वाहवाही अच्छी नहीं लगती
ज्यादा मिठाई अच्छी नहीं लगती
झूठी वाहवाही अच्छी नहीं लगती
सच, हक में .. फायदेमंद भी, पर
हमें कड़वी दवाई अच्छी नहीं लगती
तुझे ही हो मुबारक़ बुज़ुर्गों की हवेली
ये दीवार मेरे भाई अच्छी नहीं लगती
मोहब्बत में तकरार लाज़मी है मगर
पर अब ये लड़ाई अच्छी नहीं लगती
लुत्फ़ आता है हमें भी यूँ तो
पर हरदम बुराई अच्छी नहीं लगती
किसे है गुरेज़ ठहाकों कहकहों से
पर जगहंसाई अच्छी नहीं लगती
कुबूल है तेरी सारी बेवफ़ाइयां, ऐ दोस्त
तेरे मुंह से सफाई अच्छी नहीं लगती
चुरा ली नींदे नरम पलंग ने, पर क्या करें
घर में अब चारपाई अच्छी नहीं लगती
नज़र न आये मेरे अपने जहाँ से
हमें वो उंचाई अच्छी नहीं लगती
शराफत को ज़माना कमजोरी समझे
इतनी अच्छाई अच्छी नहीं लगती
कभी तो कीजिये सीधीसादी शायरी
हरदम ये गहराई अच्छी नहीं लगती
दुश्मनों को हैं कुबूल तारीफ़ यूं तो
पर दोस्तों को बड़ाई अच्छी नहीं लगती
तेरी बज़्म नवाज़ती है ‘खुलूस-ओ-दाद’ से
किसको ये कमाई अच्छी नहीं लगती
चल दिए पढ़कर, न लाइक न कमेंट
आपकी ये कोताही अच्छी नहीं लगती
फ़क़त इसलिए उसकी आदतें बुरी है
‘अमित’ को पारसाई अच्छी नहीं लगती
* पारसाई paarsaai = संयम, सदाचार Austerity, Morality
--अमित हर्ष
Sunday, October 6, 2013
इश्क अब वो झूठ है, जो बहुत बोलता हूँ मैं
मैंने गम-ए-हयात में तुझको भुला दिया
हुस्न-ए-वफ़ा शायर बहुत बेवफा हूँ मैं
इश्क एक सच था तुझसे जो बोला नहीं कभी
इश्क अब वो झूठ है, जो बहुत बोलता हूँ मैं
--जौन इलिया
Monday, September 30, 2013
Sunday, September 29, 2013
किसके चक्कर में पड़ रहा है तू
खामोशी को पकड़ रहा है तू
सबकी आँखों में गढ़ रहा है तू
उसकी बातों में गोल चक्कर है
किसके चक्कर में पड़ रहा है तू
क्या हुआ क्यूं झुकाए है नज़रें
बात क्या है बिगड़ रहा है तू
ठीक है हो गया जो होना था
क्या सही है जो लड़ रहा है तू
--अर्घ्वान रब्भी
Sunday, September 22, 2013
उनको मनाना भी खूब आता है
हद तक सताना भी खूब आता है
उनको मनाना भी खूब आता है
गुस्से मे होते हैं जब कभी हम
उनको मुस्कुराना भी खूब आता है
प्यार तो करती हैं हमसे बेपनाह
ये उनको छुपाना भी खूब आता है
लड़ती है अक्सर हमसे हमारे खातिर
प्यार उनको जताना भी खूब आता है
थक के सो जाने को जी करे तब वो
उनकी यादों का सिरहाना भी खूब आता है
किस तरह बयाँ करूँ अपना हाल-ए-दिल दीपक
--दीपक सिन्हा
Thursday, September 19, 2013
सबको ही प्यार की ज़रुरत है
सबको ही प्यार की, बस प्यार की ज़रुरत है
अब तो हर एक को दो चार की ज़रुरत है
लगा के फोन मुझे...मेरे दुश्मनों ने कहा
हमारे कुनबे को सरदार की ज़रुरत है
जब मेरी बाहों में बसी है तुम्हारी दुनिया
किस लिए फिर तुम्हें संसार की ज़रुरत है
अब तो सब देने को क़दमों में पड़ी है दुनिया
अब तो बस जुर्रत-ए-इनकार की ज़रुरत है
बस इसी वास्ते दुनिया में जंग जारी है
हमको सर की नहीं दस्तार की ज़रुरत है
ये दिल मेरा है, इसे तुम संभाल के रख लो
काम आएगा तुम्हे प्यार की ज़रुरत है
बुला रही ग़ज़ल आ भी जा मेरे सतलज
तेरे जैसे किसी अवतार की ज़रुरत है
--सतलज राहत
Saturday, September 14, 2013
पूछा न जिंदगी में किसी ने दिल का दुःख
पूछा न जिंदगी में किसी ने भी दिल का दुःख
शहर भर में ज़िक्र मेरी ख़ुदकुशी का है ।
--अज्ञात
Thursday, September 5, 2013
नज़र नज़र का फर्क होता है
नज़र नज़र का फर्क होता है हुस्न का नहीं
महबूब जिसका भी हो बेमिसाल होता है
--अज्ञात
दुनिया में तो कोई और भी होगा तेरे जैसा
दुनिया में तो कोई और भी होगा तेरे जैसा
पर हम, तुझे चाहते हैं, तेरे जैसों को नहीं
--अज्ञात
Saturday, August 31, 2013
एहसास
दोस्तों आज मुझे आप सबको बताते हुए अति प्रसन्नता हो रही है
कि मेरी खुद की कविताओं को एक किताब का रूप मिल गया है
इस में मेरे दोस्त अनंत अगरवाल ने मेरी बहुत मदद की |
और आप को पढ़ना चाहें तो खरीद सकते हैं
http://pothi.com/pothi/book/ebook-yogesh-gandhi-ehsaas
Tuesday, August 27, 2013
तुम्हारा क्या बिगाड़ा था....
तुम्हारा क्या बिगाड़ा था ? जो तुमने तोड़ डाला है
ये टुकड़े मैं नहीं लूँगा...मुझे दिल बना कर दो
--अज्ञात
Wednesday, August 21, 2013
ये कोई ग़म था जो आँखों से बह गया
ये कोई ग़म था जो आँखों से बह गया
या तुम चल दिए फिर मुझसे दूर
--शिल्पा अग्रवाल
Sunday, August 18, 2013
मेरी मंजिल मेरी हद
मेरी मंज़िल, मेरी हद
बस तुमसे तुम तक
फ़क्र ये है के तुम मेरे हो
फ़िक्र ये के कब तक
--अज्ञात
Thursday, August 15, 2013
कोई रिश्ता जो न होता तो वो ख़फा क्यों होते
कोई रिश्ता जो न होता तो वो ख़फा क्यों होते
यह बेरुख़ी उनकी मोहब्बत ही का पता देती है
--अज्ञात
Wednesday, August 7, 2013
लोगों ने रोज़ कुछ नया माँगा खुदा से
लोगों ने रोज़ कुछ नया माँगा खुदा से
एक हम ही तेरे ख़याल से आगे नहीं गए
--अज्ञात
Saturday, August 3, 2013
लोगों को हसाने के वास्ते
लोगों को हसाने के वास्ते
ज़िन्दगी बिता दी उसने
कितना अजीब था वो शख्स,
खुद कभी मुस्कुराता न था
पता नहीं किसके लिए
गज़लें लिखता रहता था
पर अपनी गज़लें
किसी को सुनाता न था
--अज्ञात
Friday, August 2, 2013
कुछ तो मेरी आँखों को पढने का हुनर सीख
कुछ तो मेरी आँखों को पढने का हुनर सीख
हर बात मेरे यार बताने की नही होती
--अज्ञात