जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की,
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना है ,
पर जहाँ से अपना दोस्त ना दिखे
वो ऊंचाई किस काम की!!
--जावेद अख्तर
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जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की,
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना है ,
पर जहाँ से अपना दोस्त ना दिखे
वो ऊंचाई किस काम की!!
--जावेद अख्तर
अब तलक गुजारी फुर्सत नहीं देती
ज़िन्दगी ये हमारी फुर्सत नहीं देती
पहले चाकरी ने मसरूफ कर रखा था
और अब ये बेकारी फुर्सत नहीं देती
कभी तो उलझा दिया दाल रोटी ने
कभी फ़िक्र-ए-तरकारी फुर्सत नहीं देती
इश्क का मुलाज़िम हूँ ड्यूटी पे हर दम
हमें छुट्टी सरकारी फुर्सत नहीं देती
दिल्लगी महज़ या कुछ हकीक़त भी
वो बात तुम्हारी फुर्सत नहीं देती
कोई है की रोज़े की रट लगाए है
किसी को इफ्तारी फुर्सत नहीं देती
रस्मन मिजाजपुरसी दस्तूरन दुआ सलाम
ये दुनिया ये दुनियादारी फुर्सत नहीं देती
सुखन आरामतलबी हममाआनी सही
पर हमें शायरी हमारी फुर्सत नहीं देती
(सुखन=कविता, हममाआनी=पर्याय)
गुरूर-ए-ग़ुरबत तो कभी फक्र-ए-फकीरी
'अमित' को ये खुद्दारी फुर्सत नहीं देती
--अमित हर्ष
तेरी तलब में रहता है आसमां पे दिमाग
तुझको पा गये होते तो जाने कहाँ होते
--अज्ञात
यही हालात इब्तदा से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे
बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे
इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे
उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे
ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे
--जावेद अख्तर
दीवान-ए-गज़ल जिसकी मोहब्बत में लिखा था
वो शक्स किसी और की किस्मत में लिखा था
वो शेर कभी उसकी नज़र से नहीं गुज़रा
जो डूब के जज़्बात की शिद्दत में लिखा था
दुनिया में तो ऐसे कोई आसार नही थे
शायद तेरा मिलना भी क़यामत में लिखा था
--अज्ञात
हिज्र लाज़िम है तो वस्ल का वादा कैसा
इश्क तो इश्क है, कम कैसा ज्यादा कैसा
लव्ज़ कितने ही तेरे पैरों से लिपटे होंगे
तूने जब आखिरी ख़त मेरा जलाया होगा
यूँही कुछ सोच लिया होगा बिछड़ने का सबब
फिर मेरा जुर्म भी लोगों को बताया होगा
तूने जब फूल किताबों से निकाले होंगे
देने वाला भी तुझे याद तो आया होगा
तूने किस नाम से बदला है मेरा नाम बता
किसको लिखा तो मेरा नाम मिटाया होगा
खलील उर रहमान 'कमर'
मतलबी दुनिया के लोग खड़े, हाथों में पत्थर ले के
मैं कहाँ तक भागूं, शीशे का मुक़द्दर ले के
--अज्ञात
गरीबों के महलों के ख़्वाब भी कमाल हैं
महल जिनमें अमीरों को नींद नहीं आती
--अज्ञात
ये बात जो गर होती मेरे इख्तियार में
सदियाँ गुज़ार देता तेरे इंतज़ार में
--सतलज राहत
बहुत थे हमारे भी कभी इस दुनिया में अपने
काम पड़ा दो चार से और हम अकेले हो गए
--अज्ञात
तोड़ कर दिल मेरा तुम हाल पूछते हो
बड़े नादाँ हो हुआ क्या बवाल पूछते हो
मनमोहन बाराकोटी
वही रंजिशें रहीं वही हसरतें रहीं
न ही दर्द-ए-दिल में कमी हुई
बड़ी अजीब सी है ज़िन्दगी हमारी
न गुज़र सकी; न ख़त्म हुई
--अज्ञात
ज़ब्त कहता है कि ख़ामोशी में बसर हो जाए
दर्द की ज़िद है कि दुनिया को खबर हो जाए
--अज्ञात
बरबादियो का जायजा लेने के वास्ते
वो पूछते हैं हाल मेरा कभी कभी
--अज्ञात
मतलब परस्ती या मासूमियत
खुदा जाने !!!!
हमने कहा मोहब्बत है
कहने लगे .... क्या मतलब ??
--अज्ञात