ख्वाब बोये थे हिज्र काटा है
इस मोहब्बत में बहुत घाटा है
--सतलज राहत
If you know, the author of any of the posts here which is posted as Anonymous.
Please let me know along with the source if possible.
दो हिस्सों में बंट गए मेरे दिल के सब अरमान
कुछ तुझे पाने निकले तो कुछ मुझे समझाने निकले
--अज्ञात
तो फिर यकीन की हद से भरम निकल जाए
हवा न हो तो चरागों का दम निकल जाए
राहत इन्दोरी
दिल-ऐ-गुमराह को ऐ काश ये मालूम हो जाता
मोहब्बत दिलचस्प है तब तक, जब तक नहीं होती
--अज्ञात
कुछ तो कम होते ये लम्हे मुसीबतों के
तुम एक दिन तो मिल जाते, दो दिन की ज़िन्दगी में
--अज्ञात
पहले हम दोनों वक़्त चुराकर लाते थे
अब तब मिलते हैं जब भी फुरसत होती है
--जावेद अख्तर
कब्र की मिटटी हाथ में लिए सोच रहा हूँ
लोग मर जाते हैं तो गुरूर कहाँ जाता है
--अज्ञात
फिर कोई दर्द मिलेगा, तैयार रह ऐ दिल;
कुछ लोग पेश आ रहे बडे प्यार से!
--अज्ञात
कसम तुम को मेरे सर की मेरे पहलू से ना सरको
अगर सरको तो यूं सरको कलम कर के मेरे सर को
पड़ा रहने दो कदमो में ना ठुकराओ मेरे सर को मज़ा उल्फत में जब आये ना मैं सरकूं ना तुम सरको
जीवन बिताया सारा इंतजार करते करते
बन जाऊ तेरी प्यारी तुझे प्यार करते करते!!!!!!!!
अज्ञात
जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की,
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना है ,
पर जहाँ से अपना दोस्त ना दिखे
वो ऊंचाई किस काम की!!
--जावेद अख्तर
अब तलक गुजारी फुर्सत नहीं देती
ज़िन्दगी ये हमारी फुर्सत नहीं देती
पहले चाकरी ने मसरूफ कर रखा था
और अब ये बेकारी फुर्सत नहीं देती
कभी तो उलझा दिया दाल रोटी ने
कभी फ़िक्र-ए-तरकारी फुर्सत नहीं देती
इश्क का मुलाज़िम हूँ ड्यूटी पे हर दम
हमें छुट्टी सरकारी फुर्सत नहीं देती
दिल्लगी महज़ या कुछ हकीक़त भी
वो बात तुम्हारी फुर्सत नहीं देती
कोई है की रोज़े की रट लगाए है
किसी को इफ्तारी फुर्सत नहीं देती
रस्मन मिजाजपुरसी दस्तूरन दुआ सलाम
ये दुनिया ये दुनियादारी फुर्सत नहीं देती
सुखन आरामतलबी हममाआनी सही
पर हमें शायरी हमारी फुर्सत नहीं देती
(सुखन=कविता, हममाआनी=पर्याय)
गुरूर-ए-ग़ुरबत तो कभी फक्र-ए-फकीरी
'अमित' को ये खुद्दारी फुर्सत नहीं देती
--अमित हर्ष
तेरी तलब में रहता है आसमां पे दिमाग
तुझको पा गये होते तो जाने कहाँ होते
--अज्ञात
यही हालात इब्तदा से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे
बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे
इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे
बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे
उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे
ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे
--जावेद अख्तर
दीवान-ए-गज़ल जिसकी मोहब्बत में लिखा था
वो शक्स किसी और की किस्मत में लिखा था
वो शेर कभी उसकी नज़र से नहीं गुज़रा
जो डूब के जज़्बात की शिद्दत में लिखा था
दुनिया में तो ऐसे कोई आसार नही थे
शायद तेरा मिलना भी क़यामत में लिखा था
--अज्ञात
हिज्र लाज़िम है तो वस्ल का वादा कैसा
इश्क तो इश्क है, कम कैसा ज्यादा कैसा
लव्ज़ कितने ही तेरे पैरों से लिपटे होंगे
तूने जब आखिरी ख़त मेरा जलाया होगा
यूँही कुछ सोच लिया होगा बिछड़ने का सबब
फिर मेरा जुर्म भी लोगों को बताया होगा
तूने जब फूल किताबों से निकाले होंगे
देने वाला भी तुझे याद तो आया होगा
तूने किस नाम से बदला है मेरा नाम बता
किसको लिखा तो मेरा नाम मिटाया होगा
खलील उर रहमान 'कमर'