Sunday, April 12, 2015

इस मोहब्बत में बहुत घाटा है

ख्वाब बोये थे हिज्र काटा है
इस मोहब्बत में बहुत घाटा है

--सतलज राहत

Tuesday, February 24, 2015

दो हिस्सों में बंट गए मेरे दिल के सब अरमान

दो हिस्सों में बंट गए मेरे दिल के सब अरमान

कुछ तुझे पाने निकले तो कुछ मुझे समझाने निकले

--अज्ञात

Monday, December 15, 2014

तो फिर यकीन की हद से भरम निकल जाए

तो फिर यकीन की हद से भरम निकल जाए

हवा न हो तो चरागों का दम निकल जाए

राहत इन्दोरी

Sunday, December 14, 2014

मोहब्बत दिलचस्प है तब तक

दिल-ऐ-गुमराह को ऐ काश ये मालूम हो जाता

मोहब्बत दिलचस्प है तब तक, जब तक नहीं होती

--अज्ञात

Saturday, November 29, 2014

कुछ तो कम होते ये लम्हे मुसीबतों के

कुछ तो कम होते ये लम्हे मुसीबतों के

तुम एक दिन तो मिल जाते, दो दिन की ज़िन्दगी में

--अज्ञात

Monday, November 24, 2014

पहले हम दोनों वक़्त चुराकर लाते थे

पहले हम दोनों वक़्त चुराकर लाते थे

अब तब मिलते हैं जब भी फुरसत होती है

--जावेद अख्तर

उसने लिखा भूल जाओ मुझे

उसने लिखा भूल जाओ मुझे

हमने भी लिख दिया कौन हो तुम?

--अज्ञात

Thursday, November 6, 2014

अजीब सी बेताबी

इक अजीब सी बेताबी है तेरे बिन

रह भी लेते हैं और रहा भी नहीं जाता

--अज्ञात

गुरूर कहाँ जाता है

कब्र की मिटटी हाथ में लिए सोच रहा हूँ

लोग मर जाते हैं तो गुरूर कहाँ जाता है

--अज्ञात

कुछ लोग पेश आ रहे हैं बड़े प्यार से

फिर कोई दर्द मिलेगा, तैयार रह ऐ दिल;
कुछ लोग पेश आ रहे बडे प्यार से!

--अज्ञात

Tuesday, October 14, 2014

कसम तुम को मेरे सर की मेरे पहलू से ना सरको

कसम तुम को मेरे सर की मेरे पहलू से ना सरको
अगर सरको तो यूं सरको कलम कर के मेरे सर को

पड़ा रहने दो कदमो में ना ठुकराओ मेरे सर को मज़ा उल्फत में जब आये ना मैं सरकूं ना तुम सरको

जीवन बिताया सारा इंतजार करते करते
बन जाऊ तेरी प्यारी तुझे प्यार करते करते!!!!!!!!

अज्ञात

Wednesday, October 1, 2014

जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,

जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की,
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की, 
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना  है ,

           पर  जहाँ से अपना दोस्त ना दिखे
               वो ऊंचाई  किस  काम  की!!

--जावेद अख्तर

Saturday, September 27, 2014

आदतें उसकी थी बस मुझे जलाने वाली 

आदतें उसकी थी बस मुझे जलाने वाली
बात की हंस के मगर दिल को दुखाने वाली

आजकल वो मुझे कुछ बदला हुआ लगता है
हो गयीं उसकी निगाहें भी ज़माने वाली

हमने इख्लास का दामन नही छोड़ा अब तक
हाय उसकी तो मोहब्बत है रुलाने वाली

मैने समझा था गुज़र जाएगा मौसम लेकिन
रुत-ए-बरसात भी निकली तो सताने वाली

तुम्हारे वास्ते अब कोई नही है वसी
खुद से बातें ना करो दिल को बहलाने वाली

-अज्ञात

Sunday, August 17, 2014

और अब ये बेकारी फुर्सत नहीं देती

अब तलक गुजारी फुर्सत नहीं देती
ज़िन्दगी ये हमारी फुर्सत नहीं देती

पहले चाकरी ने मसरूफ कर रखा था
और अब ये बेकारी फुर्सत नहीं देती

कभी तो उलझा दिया दाल रोटी ने
कभी फ़िक्र-ए-तरकारी फुर्सत नहीं देती

इश्क का मुलाज़िम हूँ ड्यूटी पे हर दम
हमें छुट्टी सरकारी फुर्सत नहीं देती

दिल्लगी महज़ या कुछ हकीक़त भी
वो बात तुम्हारी फुर्सत नहीं देती

कोई है की रोज़े की रट लगाए है
किसी को इफ्तारी फुर्सत नहीं देती

रस्मन मिजाजपुरसी दस्तूरन दुआ सलाम
ये दुनिया ये दुनियादारी फुर्सत नहीं देती

सुखन आरामतलबी हममाआनी सही
पर हमें शायरी हमारी फुर्सत नहीं देती
(सुखन=कविता, हममाआनी=पर्याय)

गुरूर-ए-ग़ुरबत तो कभी फक्र-ए-फकीरी
'अमित' को ये खुद्दारी फुर्सत नहीं देती

--अमित हर्ष

Monday, August 4, 2014

तेरी तलब में तो रहता है आसमां पे दिमाग

तेरी तलब में रहता है आसमां पे दिमाग
तुझको पा गये होते तो जाने कहाँ होते

--अज्ञात

Sunday, July 20, 2014

यही हालात इब्तदा से रहे

यही हालात इब्तदा से रहे
लोग हमसे ख़फ़ा-ख़फ़ा-से रहे

बेवफ़ा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफ़ा-से रहे

इन चिराग़ों में तेल ही कम था
क्यों गिला फिर हमें हवा से रहे

बहस, शतरंज, शेर, मौसीक़ी
तुम नहीं रहे तो ये दिलासे रहे

उसके बंदों को देखकर कहिये
हमको उम्मीद क्या ख़ुदा से रहे

ज़िन्दगी की शराब माँगते हो
हमको देखो कि पी के प्यासे रहे

--जावेद अख्तर

Saturday, July 12, 2014

किसी का ऐतबार क्या करते

किसी का ऐतबार क्या करते
जो भी देखा ख़्वाब में देखा

Tuesday, July 8, 2014

वो शक्स किसी और की किस्मत में लिखा था

दीवान-ए-गज़ल जिसकी मोहब्बत में लिखा था
वो शक्स किसी और की किस्मत में लिखा था

वो शेर कभी उसकी नज़र से नहीं गुज़रा
जो डूब के जज़्बात की शिद्दत में लिखा था

दुनिया में तो ऐसे कोई आसार नही थे
शायद तेरा मिलना भी क़यामत में लिखा था

--अज्ञात

Monday, July 7, 2014

हिज्र लाजिम है तो वस्ल का वादा कैसा

हिज्र लाज़िम है तो वस्ल का वादा कैसा

इश्क तो इश्क है, कम कैसा ज्यादा कैसा

Sunday, June 29, 2014

फिर मेरा जुर्म भी लोगों को बताया होगा

लव्ज़ कितने ही तेरे पैरों से लिपटे होंगे
तूने जब आखिरी ख़त मेरा जलाया होगा

यूँही कुछ सोच लिया होगा बिछड़ने का सबब
फिर मेरा जुर्म भी लोगों को बताया होगा

तूने जब फूल किताबों से निकाले होंगे
देने वाला भी तुझे याद तो आया होगा

तूने किस नाम से बदला है मेरा नाम बता
किसको लिखा तो मेरा नाम मिटाया होगा

खलील उर रहमान 'कमर'