जिस नगर भी जाओ, किस्से हैं कमबख्त दिल के
कोई ले के रो रहा है, कोई दे के रो रहा है
--अज्ञात
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जिस नगर भी जाओ, किस्से हैं कमबख्त दिल के
कोई ले के रो रहा है, कोई दे के रो रहा है
--अज्ञात
खुदा करे इश्क में ऐसा मकाम आये
तुझे भूलने की दुआ करूँ, और दुआ में तेरा नाम आये
--अज्ञात
किसी भी गम के सहारे नहीं गुज़रती है
ये ज़िन्दगी तो गुज़ारे नहीं गुज़रती है
मैं ज़िन्दगी तो कहीं भी गुज़ार सकता हूँ
मगर बगैर तुम्हारे नहीं गुज़रती है
--अज्ञात
अंधेरों को तो ये भी खल रहा है
दिया मेरा हवा में जल रहा है
तुम्हारे काम इतने तो नहीं हैं
तुम्हारा नाम जितना चल रहा है
--अज्ञात
बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं
कुछ ख्वाब मेरे ऐन जवानी में मरे हैं
क़ब्रों में नहीं हमको किताबों में उतारो
हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरे हैं
--अज्ञात
अफवाह थी कि मुझे इश्क हुआ है
लोगों ने पूछ पूछ कर आशिक बना दिया
--अज्ञात
तनहा तनहा मत सोचा कर..
मर जायेगा मर जायेगा.. मत सोचा कर..
प्यार घड़ी भर का ही बहुत है..
झूठा.. सच्चा.. मत सोचा कर...
जिसकी फ़ितरत ही डंसना हो..
वो तो डसेगा मत सोचा कर..
धूप में तनहा कर जाता
क्यूँ यह साया मत सोचा कर..
अपना आप गवाँ कर तूने,
पाया है क्या मत सोचा कर
राह कठिन और धूप कड़ी है
कौन आयेगा मत सोचा कर..
ख्वाब, हकीकत या अफसाना
क्या है दुनिया मत सोचा कर
मूँद ले आँखें और चले चल....
मंज़िल रास्ता.. मत सोचा कर
दुनिया के गम साथ हैं..तेरे
खुद को तनहा, मत सोचा कर
जीना, दूभर हो जायेगा
जानां, इतना मत सोचा कर
मान मेरे शहजाद वगरना
पछताएगा मत सोचा कर...
-फरहत शहजाद
कुछ रिश्ते ता उम्र अगर बेनाम रहे तो अच्छा है
आँखों आँखों में ही कुछ पैगाम रहे तो अच्छा है
सुना है मंज़िल मिलते ही उसकी चाहत मर जाती है
गर ये सच है तो फिर हम नाकाम रहें तो अच्छा है
जब मेरा हमदम ही मेरे दिल को न पहचान सका
फिर ऐसी दुनिया में हम गुमनाम रहे तो अच्छा है
--अज्ञात
(From हमनशीं album of shreya ghoshal)
कुछ इस तरह से वफ़ा की मिसाल देता हूँ
सवाल करता है कोई तो टाल देता हूँ
उसी से खाता हूँ अक्सर फरेब मंजिल का
मैं जिसके पाँव से काँटा निकाल देता हूँ
तसव्वुरात की दुनिया भी खूब दुनिया है
मैं उसके ज़हन को अपने ख्याल देता हूँ
वो कायनात की वुसअत बयान करता है
मैं एक शेर ग़ज़ल का उछाल देता हूँ
कहीं अज़ाब न बन जाये जिंदगी 'मंसूर'
उसे मैं रोज़ एक उलझन में डाल देता हूँ
--मंसूर उस्मानी
कुज उंज वी राहवां औखियाँ सन
कुज गल्ल विच गम दा तौख वी सी
कुज शहर दे लोक वी ज़ालिम सन
कुज सानू मरण दा शौक वी सी
अज़ीम मुनीर नियाज़ी
रिश्तों का धागा इतना कच्चा नहीं होता
किसी का दिल तोडना अच्छा नहीं होता
प्यार तो दिल की आवाज़ है
कौन कहता है एक तरफ़ा प्यार सच्चा नहीं होता
--अज्ञात
ये आइने तुझे तेरी खबर क्या देंगे
आ मेरी आँखों में देख ले तू कितना हसीन है
--अज्ञात
खलल, ख्यालात .. हालात से निकलती है
यूं तो हर ग़ज़ल तेरी बात से निकलती है
वही तो है जो ढल जाती है अश’आरों में
आवाज़ जो दिल-ओ-जज़्बात से निकलती है
बड़ी दिलकश है वो जो ख़्वाबों की कहानियां
वो दास्ताँ इन्हीं शाम-ओ-रात से निकलती है
बन के दरिया समन्दर में तब्दील हो गई
नदी वो सकरे जल-प्रपात से निकलती हैं
आप तलाश रहे है .. अंजाम के मुहाने पे
वजह हर वजह की शुरुआत से निकलती है
सुनो, समझो, संभालो रखो मर्ज़ी तुम्हारी
बात अब ‘अमित’ के हाथ से निकलती है
--अमित हर्ष
कोई हल है न कोई जवाब है
ये सवाल कैसा सवाल है
जिसे भूल जाने का हुक्म है
उसे भूल जाना मुहाल है
--अज्ञात
कितना आसान था तेरे हिजर में मरना जानां
फिर भी इक उमर लगी जान से जाते जाते
--अज्ञात
(From Noorjahan gazal.. itne marassim the ke aate jaate)
जाते थे मेरे हक़ में सब ही फैसले मगर
मुनसिफ ने भी हर बार दिया साथ उसी का
एक वो है के यूँ तोड़ दिए रिश्ते सभी हमसे
एक दिल है के रहता है तरफदार उसी का
--अज्ञात
ठहरी ठहरी सी तबियत में रवानी आई
आज फिर याद मोहब्बत की कहानी आई
आज फिर नींद को आँखों से बिछडते देखा
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई
मुद्दतों बाद चला उन पर हमारा जादू
मुदत्तो बाद हमें बात बनानी आई
मुद्दतो बाद पशेमा हुआ दरिया हमसे
मुद्दतों बाद हमें प्यास छुपानी आई
मुद्दतों बाद मयस्सर हुआ माँ का आँचल
मुद्दतों बाद हमें नींद सुहानी आई
इतनी आसानी से मिलती नहीं फन की दौलत
ढल गयी उम्र तो गजलो पे जवानी आई
--इकबाल अशर