Tuesday, March 8, 2011

झूठ की भी, सच के जैसी शक्सियत यारो !!

बहुत मुश्किल है कहना, क्या सही है, क्या गलत यारो !
है अब तो झूठ की भी, सच के जैसी शक्सियत यारो !!

दरिंदों को भी पहचाने, तो पहचाने कोई कैसे?
नज़र आती है, चेहरे पर, बड़ी मासूमियत यारो !

जिधर देखो, उधर मिल जायेंगे, अखबार नफरत के
बहुत दिन से, मोहब्बत का न देखा, एक खत यारो !!

वहाँ पर पड़े, कांटेदार ज़हरीला ही उगता है
सियासत की ज़मीन में, है न जाने क्या सिफत यारो !!
[सिफत=quality]

तुम्हारे पास, दौलत की ज़मीन का, एक टुकड़ा है
हमारे पास है, ख़्वाबों की पूरी सल्तनत यारो !!

--कमलेश भट्ट कमल

No comments:

Post a Comment